2. प्रांतीय कार्यपालिका - Page 36

प्रांतीय कार्यपालिका

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अर्थात् कानून और व्यवस्था के सतत् आरक्षण के बारे में अपने विरोध के कारण बताता हूँ। किसी मंत्री को कानून और व्यवस्था का कार्यभार सौंपने के विरोध में मुख्य तर्क यह है कि मंत्री मतदाताओं की इच्छा के अधीन होता है और परिषद् में प्रतिकूल मतदान द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वह विभाग का काम निष्पक्ष रूप से नहीं कर पाएगा। अतः डर है कि इस स्थिति के परिणामस्वरूप उस विभाग की सेवाओं की स्थिति भ्रामक हो जाएगी। चूँकि मंत्रियों को मालूम नहीं होता कि कब उनका समर्थन किया जाएगा और कब उनकी निंदा की जाएगी, अतः इस अनिश्चितता से उनका काम ठप्प हो जाएगा और शांति और सुशासन का गंभीर अहित होगा। यह भी कहा गया है कि अर्से से हिन्दू - मुस्लिम दंगों का सिलसिला आम बात हो गई है और इन्हें देखते हुए हमें कानून और व्यवस्था का कार्यभार किसी मंत्री को नहीं सौंपना चाहिए। कारण यह है कि मंत्री जनमत के ज्वार - भाटे से डाँवाडोल होता रहता है, और वह सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकता है। चाहे वे हिन्दुओं के हों या मुसलमानों के।

  1. साफ बात यह है कि इस तर्क का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, यद्यपि मेरे साथी इससे काफी प्रभावित हुए लगते हैं। यह तो नौकरशाही का घिसापिटा तर्क है। इसे मानने का मतलब यह मानना है कि नौकरशाही का शासन सबसे अच्छा शासन है। भारत में लोग दुर्भाग्य से नौकरशाही के शासन को इतने समय से जानते हैं कि कोई भी ऐसे तर्क से धोखा नहीं खा सकता। यह इतना निरंकुश है कि इसे स्वीकार करना हर प्रकार के उत्तरदायी शासन को नकारना होगा। उत्तरदायी शासन का पिछला इतिहास कुछ भी रहा हो, यह मानना पड़ेगा कि इसने भारत में डेरा जमा लिया है। यदि समय के साथ - साथ कोई परिवर्तन हो, तो वह इस सिद्धांत के विस्तार की दिशा में ही होना चाहिए। अतः ऐसी कोई भी योजना, जो इस मूल सिद्धांत के विस्तार में बाधक है, शासन और जनता के बीच गंभीर संघर्ष पैदा करेगी। मुझे नौकरशाही के तर्क के अनुसार चल कर अनावश्यक रूप से ऐसा संघर्ष पैदा करने का कोई कारण नजर नहीं आता। क्योंकि मेरे विचार से ऐसा कोई अनुभव नहीं है, जिससे यह डर हो कि मंत्री सदन में अपने अनुयायियों के होहल्ले के आगे झुक जाएँगे या उनके अनुयायियों का रवैया द्वेषपूर्ण होगा। उनको लेकर ऐसी कोई आशंका उनके प्रति बहुत बड़ा अन्याय होगा। 1922 में जब गाँधीजी का प्रभाव अपने चरम शिखर पर था, तो असहयोग आंदोलनकारियों द्वारा स्थानीय बोर्डों तथा म्युनिसिपैलिटियों पर अधिकार कर लिए जाने के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। इससे हम कह सकते हैं कि आवश्यकता पड़ने पर अपने मतदाताओं की इच्छा - अनिच्छा का विचार किए बिना स्वतंत्र रूप से कार्यवाही करने के लिए मंत्रियों पर भरोसा किया जा सकता है। मुझे विश्वास है कि सरकार के सदस्य इस बात की गवाही देंगे कि बंबई विधान परिषद् ने सदा अपेक्षित संयम से काम लिया है, जो उत्तरदायित्व - बोध के साथ प्राप्त होता है। लेकिन यदि कोई यह मानने को मजबूर हो कि सांप्रदायिक भावना और सांप्रदायिक संघर्ष के समय सदन शांत नहीं रह सकता,