20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
तो यह हस्तांतरण के विरुद्ध तर्क नहीं है। क्योंकि इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि चाहे दूसरे संप्रदाय के प्रति किसी संप्रदाय का रवैया कैसा भी हो, अव्यवस्था में उसका कोई ऐसा निहित स्वार्थ नहीं होता, जिसके कारण वह अपने मान्यताप्राप्त प्रतिनिधियों को इतना गैरजिम्मेदारी का पाठ पढ़ाए कि वे शांति तथा सद्भाव के विरुद्ध ही अपने कदम उठाने लगें। अतः जो लोग कानून और व्यवस्था के आरक्षण का समर्थन करते हैं, उनके दिल और दिमाग पर अनदेखा, अनजाना और अपरीक्षित डर बैठा हुआ है। मेरे साथी हस्तांतरण की सिफारिश न करने में निस्संदेह बहुत फूंक - फूंक कर कदम उठा रहे हैं। लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कि वे ऐसा करके अति विवेकपूर्ण रास्ते पर चल रहे हैं। कारण यह है कि अत्यधिक सावधानी ऐसा प्रयोग करने की अनुमति नहीं देती, जिससे पता चल सके कि डर असली है या नहीं, जबकि अति विवेक ऐसा प्रयोग करने की मांग करता है। कानून और व्यवस्था को हस्तांतरित करने के विरुद्ध अब जिस अनजाने डर की दुहाई दी जा रही है, इसी डर की दुहाई 1919 में मंत्रियों को वे विषय सौंपने के विरुद्ध दी गई थी, जो अब उनके अधीन हैं। लेकिन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट और भारत शासन दोनों ने इन तर्कों की उपेक्षा की और यह जोखिम उठाने की अनुमति प्रदान की। कानून और व्यवस्था के बारे में मैं वैसा ही रवैया अपनाना चाहता हूँ।
- लेकिन एक अन्य कारण से भी हमें यह प्रयोग करना चाहिए। बुद्धिमानी इसी में है कि हम इसे अविलम्ब करें। स्पष्ट है कि किसी विषय के हस्तांतरण के साथ सेवाओं में भारतीय कर्मचारियों की संख्या बढ़ जाएगी। हो सकता है कि यूरोपीय कर्मचारियों की अपेक्षा भारतीय कर्मचारी कम कुशल हों और वे कम अनुभवी तो हैं ही। कानून और व्यवस्था के हस्तांतरण को टालने का अर्थ है संक्रमण की हर अवस्था से जुड़े खतरों को बढ़ाना अतः तुरंत ऐसा कदम उठा कर उस स्थिति से उभरना सर्वाधिक सुरक्षित उपाय है, क्योंकि अभी हमारे पास अनुभवी प्रशिक्षित सिविल अधिकारी हैं। यथासंभव कम से कम अव्यवस्था के साथ नए संविधान का संचालन करने में उनकी निष्ठापूर्ण सहायता पर भरोसा किया जा सकता है। मेरे लिए यह खुशी की बात है कि यह सुझाव एक महत्वपूर्ण अधिकारी ने दिया है। वस्तुतः यह सुझाव एक अनुभवी सिविल अधिकारी का है, जिसने अपने विचार एक नोट के रूप में श्री बार्कर को सूचित किए थे। श्री बार्कर ने इसे अपनी पुस्तक “फ्यूचर ऑफ गवर्नमेन्ट ऑफ इन्डिया एंड दि आई.सी.एस.” में पुनः प्रस्तुत किया है।
श्री बार्कर ने कहा, “एक अनुभवी सिविल अधिकारी द्वारा लिखे गए नोट से मैं ऐसी आलोचना की कुछ पंक्तियाँ देना चाहता हूँ ख्. . ., नोट के लेखक का सबसे पहला तर्क है कि कानून और व्यवस्था को बनाए रखने और मालगुजारी तथा काश्तकारी के अधिकारों से संबंधित मामले हस्तांतरित किए जाने चाहिएं।” उनका कहना है कि, “इन विभागों का प्रशासन भारत में सेवाओं की सबसे योग्य तथा शक्तिशाली शाखा - इंडियन सिविल सर्विस - द्वारा किया जाता है। उनके प्रशासन के सिद्धांत काफी पहले निर्धारित किए गए हैं और भली प्रकार समझे - बूझे हैं। इस सेवा की अपनी महान परंपरा है, जिससे