प्रांतीय कार्यपालिका
सुनिश्चित है कि प्रशासन को सर्वोत्तम सहायता तथा स्पष्ट सलाह मिलेगी। ख्. . ., ’’
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यह भी मानी हुई बात है कि भारत के लोग बहुत शांतिप्रिय हैं और उन पर आसानी से शासन किया जा सकता है। यह दूसरी बात है कि जाति या धर्म को प्रभावित करने वाली बातों से वे कभी - कभी उत्तेजित हो सकते हैं। अतः कानून और व्यवस्था कायम रखने का काम बहुत कठिन नहीं है। ख्. . ., यह तर्क कि मालगुजारी और काश्तकारी के मसले विधायिका में प्रतिनिधित्व करने वाले वर्गों के हितों की अपेक्षा जनता के हितों को अधिक प्रभावित करते हैं (और इसलिए, ऊपर वर्णित पाँचवें नियम के अनुसार, इसका हस्तांतरण नहीं होना चाहिए) प्रांतों के लिए प्रस्तावित मताधिकार और निर्वाचन की योजना से बिल्कुल मेल नहीं खाता . . . . जो व्यक्ति खंडों में विभक्त प्रणाली का प्रबल समर्थक है और विभागों के विशेष रूप से कानून और व्यवस्था तथा मालगुजारी प्रशासन संबंधित विभागों के हस्तांतरण से डरता है, वह भी स्वीकार करता है कि वह अपनी ही योजना से डरा हुआ है। भले ही मैं दोहरे शासन का समर्थक हूँ, फिर भी मुझे यह प्रयोग करने में डरना नहीं चाहिए। कारण यह है कि मुझे आशा है कि मंत्रियों में इतनी सहज बुद्धि, सद्भावना और धैर्य होना ही चाहिए, जो किसी भी योजना की सफलता के लिए अति आवश्यक है, चाहे वह दोहरे शासन से संबंध रखे या न रखे।
- कानून और व्यवस्था के हस्तांतरण के बारे में अल्पसंख्यकों की चिंता को मैं भली प्रकार समझता हूँ। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि वे आरक्षण से किस प्रकार फायदे की उम्मीद करते हैं। यदि नौकरशाह कोई भारतीय हो, तो व्यक्तिगत पक्षपात के विचार से, कानून और व्यवस्था के प्रभारी के रूप में किसी नौकरशाह और मंत्री में कोई अंतर नहीं होगा। यदि प्रभारी कोई यूरोपीय हो, तो अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि वह तटस्थ होगा। लेकिन इससे तो कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि तटस्थ व्यक्ति पक्षपात रहित होगा ही। इसके विपरीत तटस्थ व्यक्ति की अपनी रुचि और पूर्वाग्रह भी होते हैं और यदि उसकी ऐसी कोई रुचि नहीं है, तो वह उपेक्षा कर सकता है। अतः कानून और व्यवस्था के आरक्षण के लिए आतुर अल्पसंख्यकों के लिए यूरोपीय नौकरशाह अनिश्चित लाभ वाला सिद्ध होगा। मेरी समझ में यह नहीं आता कि अल्पसंख्यकों के कुछ प्रतिनिधि क्यों इस बात को अनुभव नहीं कर पाते कि नौकरशाही के मुकाबले मंत्री स्तर की प्रणाली उन्हें कहीं अधिक लाभ पहुँचाती है। कार्यपालिका के कामों पर नियंत्रण की शक्ति ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की सबसे अच्छी गारन्टी है। नौरकशाही तंत्र पर इस नियंत्रण का कोई प्रभाव नहीं होता। यदि यह अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है, तो केवल इसलिए कि यह ऐसा करना चाहता है। लेकिन यदि कभी वह कोई कार्रवाई न करना चाहे तो अल्पसंख्यकों के पास कोई उपाय नहीं है। दूसरे शब्दों में, मंत्री पर हुक्म चलाया जा सकता है, लेकिन नौकरशाह को सलाह भी नहीं दी जा सकती। नौकरशाह और मंत्री के शासन में मुझे यही महत्वपूर्ण अंतर मालूम होता है। यद्यपि मेरा संबंध उस अल्पसंख्यक वर्ग से है, जिसके सदस्यों के