प्रांतीय कार्यपालिका
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से, दूसरे का कार्यपालिका में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व से, तीसरे का कार्यपालिका का उत्तरदायित्व लागू करने से और चौथे का कार्यपालिका के सदस्यों के बीच पारस्परिक संबंध से है।
पहले प्रश्न के बारे में कहा जाता है कि विधायिका के सदस्यों के सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के कारण विधायिका में गुटबंदी होगी ही। मंत्रियों का लगाव सिद्धांतों के बदले संप्रदाय के प्रति अधिक हो सकता है। इससे मंत्रिमंडल सांप्रदायिक निष्ठा की अनिश्चित नींव पर टिका होता है और निष्ठा की मात्रा सांप्रदायिक लाभ के अनुपात में घटती - बढ़ती रहती है। अतः यदि कोई संप्रदाय सिद्धांतों का ध्यान रखे बिना अपनी इच्छानुसार निष्ठा - परिवर्तन करना चाहे, तो मंत्रिमंडल उतनी ही जल्दी टूट सकते हैं, जितनी जल्दी बनते हैं। इस बुराई से बचने के लिए सुझाव है कि परिषद् में विभिन्न समूहों द्वारा चुने गए व्यक्तियों में से मंत्रिमंडल बनाया जाए और एक बार मंत्रिमंडल बनने के बाद परिषद् की अवधि के दौरान उसे हटाया न जाए। मैं मानता हूँ कि अस्थिर या अस्थायी कार्यपालिका की आशंका सही हो सकती है। लेकिन मैं नहीं समझता कि इसके लिए किसी उपाय की या जैसा उपाय सुझाया गया है, उसकी जरूरत है। भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जहाँ विधायिका में गुटबंदी की भावना दिखाई देती है। फ्रांस का चेम्बर ऑफ डेपुटीज़ गुटबंदी की भावना का ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ मंत्रिमंडल प्रायः भंग होते रहते हैं। इस पर भी फ्रांसीसी यह महसूस करते हैं कि स्थिति खराब तो है, लेकिन इतनी असह्य नहीं है कि इसके लिए किसी उपाय या इलाज की जरूरत हो। यदि यह मान लिया जाए कि आशंका सच हो जाती है और स्थिति असह्य हो जाती है, तो भी मुझे विश्वास है कि उपाय सही नहीं है। इसमें दो राय नहीं है कि इस उपाय से मंत्रियों की उत्तरदायित्व की भावना बहुत निर्बल हो जाएगी। मुझे डर है कि यह योजना गुटों में मेल - मिलाप कराने के बजाए उन्हें कट्टर बनाएगी और गुटबन्दी की जड़ों को सदा सर्वदा सींचती रहेगी। इस प्रकार यह उपाय या इलाज रोग का उपचार करने के बदले उसे और बढ़ा देगा। मुझे तो मौजूदा निर्वाचन - क्षेत्रों का पुनर्निर्माण ही सही उपाय प्रतीत होता है।
मैं देश की कार्यपालिका में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को मान्यता देने का घोर विरोध करता हूँ। ऐसा करने से शासन - तंत्र के एक सबसे महत्वपूर्ण अंग को सबसे भयानक रोग ग्रस लेगा। कैबिनेट में प्रतिनिधित्व के हकदार जितने संप्रदायों को मान्यता देनी होगी, उनकी संख्या के आधार पर यह दुहरा या तिहरा शासन होगा। यह शासन निस्संदेह सांप्रदायिक स्वरूप का दोहरा शासन होगा और आज के राजनीतिक स्वरूप के दोहरे शासन से कुछ भिन्न होगा। लेकिन इस कारण यह राजनीतिक स्वरूप के दोहरे शासन से बेहतर नहीं हो जाएगा। एक प्रणाली के निहित दोष दूसरी में भी निहित हैं और यदि संवैधानिक पुनर्निर्माण का हमारा उद्देश्य एकीकृत शासन है, तो दोहरे शासन के राजनीतिक रूप की तरह ही उसके सांप्रदायिक रूप को भी तुरंत ठुकरा देना चाहिए। राजनीतिक स्वरूप के दोहरे शासन को अस्वीकार करने की अपेक्षा सांप्रदायिक स्वरूप के दोहरे शासन को अस्वीकार करने का असल में बड़ा कारण है।