24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
राजनीतिक स्वरूप के दोहरे शासन में सिद्धांतों पर आधारित शासन की संभावना बनी रहती है। लेकिन सांप्रदायिक स्वरूप के दोहरे शासन का परिणाम तो निश्चय ही वर्ग की विचारधारा पर आधारित शासन होगा।
ग्रेट ब्रिटेन और स्वशासी डोमिनियनों के संवैधानिक कानून का मूलभूत सिद्धांत है कि प्रत्येक मंत्री न्यायालयों के प्रति जवाबदेह होता है। असल में, इस विवेकपूर्ण सिद्धांत के कारण ही ब्रिटिश प्रजा, चाहे वह स्वदेश में हो या डोमिनियनों में, मंत्रियों के दोषपूर्ण कार्यों से अपनी जान - माल की रक्षा कर पाती है। अवैध कार्यों के लिए कार्यपालिका की वैध जिम्मेदारी के मामले में केवल भारत का ही ग्रेट ब्रिटेन और डोमिनियनों से विचित्र विरोध है। सर इलियाजाह इम्पे की अध्यक्षता वाली न्यायपालिका और वारेन हेस्टिंग्स के समर्थन वाली कार्यपालिका के बीच एक खासा संघर्ष हुआ। इस संघर्ष के दौरान भारत में कार्यपालिका ने 1780 में ही न्यायालयों के नियंत्रण से अपने आपको मुक्त करा लिया। वह उन्मुक्ति तब से अब तक चली आ रही है और अब इसे भारत शासन अधिनियम की धारा 110 और 111 में शामिल किया गया है। अब तक इस उन्मुक्ति को इसलिए बर्दाश्त किया गया कि यह स्थानीय थी, सामान्य नहीं। इसमें व्यवस्था की गई थी कि भारत में अवैध कार्यों के लिए कार्यपालिका के जिन सदस्यों पर भारत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था, उन पर इंग्लैंड में मुकदमा चलाया जा सकता था। जवाबदेही की यह पद्धति दूरस्थ तो थी, लेकिन प्रभाव में कम नहीं थी, क्योंकि पुराने शासन के अधीन कार्यपालिका का लगभग प्रत्येक सदस्य यूरोपीय होने के नाते इंग्लैंड वापिस जाता था। अब कार्यपालिका के गठन में परिवर्तन हो गया है। इसके अधिकतर कर्मचारी भारतीय हैं और चूँकि उनमें से किसी के इंग्लैंड जाने की संभावना बहुत कम है, अतः उनकी जिम्मेदारी उन पर वस्तुतः कभी भी डाली नहीं जा सकती। आज जो स्थिति है, उसमें मंत्रियों के गलत कार्यों के विरुद्ध तात्कालिक या दुरगामी कोई उपाय नहीं है। इस स्थिति को चालू रहने देना संवैधानिक शासन की नींव को ही नष्ट करना है। अतः मैं सिफारिश करता हूँ कि भारत सरकार अधिनियम की धारा 110 और 111 में संशोधन करना चाहिए, ताकि मंत्रियों के आदेश से किए गए अवैध कार्यों के लिए ब्रिटिश प्रजा, चाहे भारतीय हो या यूरोपीय, न्यायालय का दरवाजा खटखटा सके। मंत्रियों के संबंध में कानून में ऐसे परिवर्तन के लिए 1919 में अनुरोध किया गया था। लेकिन उस समय यह अनुरोध स्वीकर नहीं किया गया, क्योंकि ऐसा समझा गया था कि इसे स्वीकार करने से मंत्रियों और कार्यकारी पार्षदों के बीच आपत्तिजनक भेदभाव पैदा हो जाएगा। प्रांतों में पूर्णतः उत्तरदायी शासन लागू होने के बाद अब इस आपत्ति में कोई दम नहीं है।
मैं अवैध कार्यों के लिए मंत्रियों की वैध जिम्मेदारी को लागू करने के विचार का जोरदार समर्थन करता हूँ। अतः मेरा सुझाव है कि संविधान में एक ट्रिब्यूनल के