प्रांतीय कार्यपालिका
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गठन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके सदस्य विधायिका के सदस्य या अंशतः विधायिका और अंशतः न्यायापालिका के सदस्य हो सकते हैं। इस ट्रिब्यूनल में गैरकानूनी कार्यों या राष्ट्र हित के प्रतिकूल कार्यों के लिए मंत्रियों पर महाभियोग चलाया जा सकता है। मैं जानता हूँ कि मंत्रियों को उत्तरदायित्व के चलन के कारण महाभियोग का चलन बंद हो गया है। लेकिन मैं समझता हूँ कि भारत में मंत्रियों का उत्तरदायित्व अभी पनप ही रहा है और जब तक विधायिका तथा कार्यपालिका इसके निहितार्थ से परिचित न हो जाए, तब तक सत्ता के असंयम पर अंकुश लगाने का प्रत्यक्ष साधन मुहैया कराना बेहतर है। कारण यह है कि सत्ता उन हाथों में रहेगी, जिन्हें इसका अभ्यास नहीं है और जो जाति तथा पंथ के प्रति अतिशय निष्ठा के कारण इसका दुरुपयोग कर सकते हैं। बचाव का उपाय कभी भी इसलिए फालतू नहीं हो जाता कि अक्सर इसका प्रयोग ही नहीं किया जाता।
- कार्यपालिका के सदस्यों के बीच संबंध निश्चित करते समय देखना होगा कि क्या प्रत्येक सदस्य केवल अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी हो या प्रत्येक सबके कार्यों के लिए उत्तरदायी हो, अर्थात् उत्तरदायित्व व्यक्तिगत हो या संयुक्त। यह ऐसी समस्या है जिसके बारे में कोई सिद्धांत नहीं बघारा जा सकता। फिर भी, मैं संयुक्त उत्तरदायित्व का समर्थक हूँ। मैं जानता हूँ कि इस पद्धति के अधीन दोषी मंत्री को दंड देने के मामले में विधायिका लगभग असहाय है। संयुक्त उत्तरदायित्व की स्थिति में विधायिका उस मंत्री को बर्खास्त नहीं कर सकेगी, जिसके कार्यों से वह सहमत न हो। जब तक विधायिका उसके साथियों से भी पिंड छुड़ाने के लिए तैयार न हो तब तक वह औपचारिक रूप से उसकी निंदा भी नहीं कर सकेगी। संसदीय कार्यपालिका युक्त कोई भी विधायिका ऐसा करने का दुस्साहस नहीं कर सकती। क्योंकि यदि वह ऐसा करती है और कार्यपालिका को अपदस्थ करती है तो कार्यपालिका भी विधायिका को भंग करने की मांग करके विधायिका का तख्ता पलट देगी। इस दोष के होते हुए भी मैं दो कारणों से संयुक्त उत्तरदायित्व के पक्ष में हूँ। आधुनिक राज्य में प्रशासी निकाय के रूप में कार्यपालिका का कानून को लागू करने का कार्य गौण कार्य हो गया है। इसका मुख्य कार्य नीति निर्धारित करना और विधायिका के विचारार्थ प्रस्ताव प्रस्तुत करना है। वस्तुतः यह कार्य इतना जरूरी है कि यदि कार्यपालिका इसे न करे तो विधायिका की उपयोगिता काफी कम हो जाएगी। कार्यपालिका नीति - निर्धारण का काम कर सके, इसके लिए उसके सदस्यों में दृष्टिकोण की समानता होनी चाहिए। कार्यपालिका में पूर्ण सामंजस्य के बिना दृष्टिकोण की ऐसी समानता संभव नहीं है। मुझे लगता है कि केवल संयुक्त उत्तरदायित्व से ऐसा सामंजस्य सुनिश्चित हो सकता है। संयुक्त उत्तरदायित्व की सिफारिश करने का दूसरा कारण यह है कि मुझे आशंका है कि व्यक्तिगण उत्तरदायित्व जाति और धर्म की सीमाओं को लांघ कर एक साझे राजनीतिक मंच के विकास में कभी सहायक नहीं होगा। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व गुटों को कायम रखेगा और प्रेसिडेंसी को हमेशा गुटों की मिलीजुली सरकार