प्रांतीय कार्यपालिका
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प्रतिनिधित्व करने वाला संवैधानिक प्रमुख नहीं है। न ही उसकी स्थिति ऐसी है कि वह प्रांत के शासन की बागडोर पूर्णतः संभाल सके। वह दोनों नावों पर सवार रहता है। गवर्नर या शासन - तंत्र के कुशल संचालन की दृष्टि से गवर्नर की ऐसी स्थिति जिसमें उसे एक तानाशाह और संवैधानिक प्रमुख की दोहरी भूमिका निभानी पड़े, कोई अच्छी स्थिति नहीं है। गवर्नर की स्थिति के बारे में जैसी भी कठिनाइयाँ रही हों, वे 1919 में लागू किए गए संविधान के अनुकूल थीं। चूँकि संविधान ने पूर्णतः उत्तरदायी सरकार की स्वीकृति नहीं दी थी, अतः गवर्नर की स्थिति, निस्संदेह, संवैधानिक प्रमुख की नहीं थी। दूसरी ओर, चूँकि प्रांत के कुछ विभागों के कार्य का संचालन उत्तरदायी मंत्रियों को सौंप दिया गया था, अतः गवर्नर की पहले वाली अनुत्तरदायी प्रमुख की स्थिति नहीं रही थी। इस प्रकार एक विवेकपूर्ण सिद्धांत के आधार पर गवर्नर की सिथति में परिवर्तन किया गया था। इस सिद्धांत के अनुसार गवर्नर के कार्यकारी अधिकार कम किए गए और उसी अनुपात में उत्तरदायी सरकार को बढ़ावा दिया गया। गवर्नर की स्थिति और उत्तरदायित्व के हस्तांतरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने का जो सिद्ध ांत 1919 में निर्धारित किया गया था, उसके तर्क का अनुसरण करते हुए मैं सिफारिश करता हूँ कि प्रांत के गवर्नर की स्थिति संवैधानिक प्रमुख की कर दी जाए। असल में गवर्नर की स्थिति के बारे में इसके अतिरिक्त ऐसा कुछ सोचा भी नहीं जा सकता, जो पूर्णतः उत्तरदायी शासन - प्रणाली के अनुकूल हो।
जहाँ तक उसकी शक्तियों का संबंध है, क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में प्रांत की कार्यपालिका में उसे कैबिनेट के लिए नियुक्तियाँ करने की शक्ति प्राप्त रहेगी। इसी हैसियत से उसे प्रशासन की किसी शाखा से संबंधित मामले में मंत्री द्वारा प्रस्तावित किसी आदेश को स्वीकृति देने या न देने का अधिकार होगा। जहाँ तक विधायिका में सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उसकी शक्तियों का संबंध है, उसे परिषद् द्वारा पास किए गए बिलों को (1) अनुमति देने, (2) हिज मेजेस्टी की स्वीकृति मिलने तक अनुमति रोके रखने; और (3) अनुमति देने से इंकार करने का अधिकार प्राप्त होगा।
गवर्नर को दिए गए इन अधिकारों के प्रयोग के लिए शर्त यह होनी चाहिए कि इनका प्रयोग विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह से होगा। इसका यह मतलब नहीं है कि वह मंत्रियों से असहमत नहीं हो सकता। इसके विपरीत, उसे आजादी होगी कि वह अपने मंत्रियों को बता सके कि वह उनकी नीतियों का समर्थन नहीं करता। यदि कोई मंत्री ऐसी नीति के बारे में अड़ा रहता है, जिसका गवर्नर विरोध करता है, तो वस्तुतः उसे मंत्री को बर्खास्त करने की आजादी होगी। संवैधानिक प्रमुख के नाते उस पर ऐसा कोई बंधन नहीं लगाया जा सकता कि वह विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्री की सलाह के अनुसार चले। उसके बंधन का मूलमंत्र मतदाताओं की इच्छा है। यदि वह किसी मंत्री की सलाह से सहमत होता है, तो इसका कारण यही