28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
है कि मंत्री मतदाताओं की इच्छा का प्रतिनिधि समझा जाता है। लेकिन ऐसे अवसर भी आ सकते हैं, जब उसे संदेह हो कि मंत्री मतदाताओं की इच्छा का सही प्रतिनिधित्व कर रहा है या नहीं। इसके परिणामस्वरूप सब उत्तरदायी सरकारों के संविधान न केवल इस संभावना को स्वीकार करते हैं बल्कि उसे मतदाताओं की इच्छा जानने के लिए सब संभव साधन प्रदान करते हैं। इस उद्देश्य से प्रत्येक उत्तरदायी सरकार का संविधान गवर्नर को अनुमति देता है कि वह मंत्रियों को बर्खास्त करके ऐसे नये मंत्री नियुक्त कर सके जो उससे सहमत हों। आशा की जाती है कि विधायिका इन मंत्रियों का समर्थन करेगी। यदि विधायिका नये मंत्रियों का समर्थन करने से इंकार करे तो सब उत्तरदायी सरकारों के संविधानों में एक और उपाय भी है और वह है समर्थन के लिए मतदाताओं से अपील करना। प्रांत के गवर्नर को इन सब संसाधनों के प्रयोग की अनुमति होनी चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कोई संविधान उसे इससे अधिक शक्ति नहीं देता। यदि मतदाताओं की इच्छा जान लेने पर पाया जाए कि जनमत गवर्नर के विरुद्ध है, तो प्रत्येक उत्तरदायी सरकार के संविधान में उसके लिए झुकने, पदत्याग करने या लड़ने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। प्रांत के गवर्नर को इन संसाधनों से संतुष्ट रहना चाहिए। मौजूदा संविधान के अनुसार उसे विधायिका द्वारा पास न किए गए विधेयकों को प्रमाणित करने, विधायिका द्वारा अस्वीकृत
खर्च की मंजूरी देने या मंत्रियों को बर्खास्त करके संविधान को निलंबित करने और सारा कामकाज स्वयं संभालने की शक्ति प्राप्त है। ऐसी निरंकुश शक्तियां उसे किसी भी परिस्थिति में नहीं मिल सकतीं। अतः गवर्नर को संवैधानिक प्रमुख बनाने के लिए आवश्यक है कि उसकी प्रमाणन और निलंबन की शक्तियां ले ली जाएँ। इस प्रकार विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह के बिना स्वतंत्र रूप से काम करना उसके लिए असंभव हो जाएगा।
जिस धारा के अनुसार गवर्नर मंत्रियों की सलाह से कार्य करने के लिए बाध्य हो, उसकी सुस्पष्ट भाषा निश्चित करना महत्वपूर्ण है। इस संबंध में धारा 52(3) की शब्दावली बहुत अस्पष्ट प्रतीत होती है। इसकी शब्दावली इतनी अनिश्चित है कि उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा नहीं होता। ‘गवर्नर मंत्रियों की सलाह से कार्य करेगा’ कहने के बदले यह कहना बेहतर होगा कि ‘गवर्नर का कोई भी आदेश तब तक वैध नहीं होगा, जब तक कि मंत्री भी उस पर हस्ताक्षर न करे’। ऐसी भाषा का बंधनकारी बल स्पष्ट है। तदनुसार मैं धारा की भाषा में ऐसा परिवर्तन करने की सिफारिश करता हूँ।
गवर्नर की शक्तियों की परिभाषा के साथ - साथ कार्यपालिका में उसका स्थान भी स्पष्ट हो ही जाना चाहिए। प्रांत के कार्य - संचालन से मुक्त होने के बाद गवर्नर का कार्य कार्यकारी के बदले पर्यवेक्षी हो जाता है। उसका मुख्य काम यह देखना है कि जिन लोगों को उत्तरदायित्व सौंपा गया है, वे संविधान में उनके मार्गदर्शन के