3. प्रांतीय विधायिका - Page 47

परिच्छेद III
प्रांतीय विधायिका

अध्याय 1

मताधिकार

  1. मेरे साथियों की सिफारिश है कि शहरी क्षेत्रों में मताधिकार की व्यवस्था यथावत रहने दी जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में मताधिकार के लिए लगान संबंधी सीमा को घटाकर आधा कर दिया जाए। मैं इससे सहमत नहीं हो सकता। मेरे साथियों ने मताधिकार के प्रश्न के बारे में सोचा है, जैसे यह अधिकार का नहीं रियायत का सवाल है। किसी भी देश में ऐसा दृष्टिकोण मेरे ख्याल से इतना घातक है कि इसे राजनैतिक समाज के आधार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि प्रतिनिधित्व के अधिकार की संकल्पना को असंगत कहकर ठुकरा दिया जाए, यदि प्रतिनिधित्व के नैतिक दावे को काल्पनिक या भावनात्मक अवरोध मात्र मान लिया जाए, यदि मताधिकार को एक ऐसा विशेषाधिकार मान लिया जाए, जिसे राजनीतिक सत्ताधारी उसके संभावित उपयोग के अपने आकलन के अनुसार जब चाहें दे दें या न दें तो यह निश्चित है कि मताधिकारहीन लोगों की राजनीतिक मुक्ति पूर्णतः उन लोगों की मुट्ठी में बंद हो जाएगी जिन्हें मताधिकार प्राप्त है ऐसे निष्कर्ष को स्वीकार करना तो यह स्वीकार करना है कि दासता में कोई बुराई नहीं। क्योंकि दासता के मूल में भी यह कल्पना होती है कि दासों का कोई अधिकार नहीं होता सिवाय उसके जो सत्ताधारी वर्ग अपनी इच्छा से उसे दे दे। ऐसे किसी निष्कर्ष वाले सिद्धांत के लिए तो कहना ही पड़ेगा कि वह किसी भी जन - निर्वाचित शासन प्रणाली के लिए घातक विष है अतः मैं उसे पूर्णतः अस्वीकार करता हूँ।

  2. मताधिकार के प्रश्न के बारे में मेरे साथी सोचते हैं कि यह तो सिर्फ इतनी सी बात है कि कागज का एक ऐसा टुकड़ा मतपेटी में डालने का अधिकार दिया जाए, जिस पर कुछ नाम लिखे हों। यदि ऐसा न होता तो साक्षरता को मताधिकार का मापदंड बनाने पर जोर न देते। मताधिकार के बारे में इस प्रकार का दृष्टिकोण निश्चित रूप से छिछला व उथला है, क्योंकि उसमें इस अधिकार के उद्देश्य के प्रति पूर्ण भ्रांति है। यदि बहुसंख्यकों के दिमाग में यह बात साफ होती कि मताधिकार की