प्रांतीय विधायिका
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सही तस्वीर क्या है, तो वे मताधिकार के महत्व को समझते। वह मतपत्र पर निशान भर लगा देना नहीं है। ‘वह तो ऐसी व्यवस्था का प्रतीक है, जिसमें उन शर्तों के नियमन में सीधी तथा सजग साझेदारी हो जिन पर सहजीवन आधारित होगा और कल्याण का झंडा लहराया जाएगा’। एक बार यदि मताधिकार की इस अवधारणा को स्वीकार कर लिया जाए, तो उसका अर्थ होगा उस प्रत्येक व्यस्क को मताधिकार दिया जाए, जो पागल नहीं है। सहजीवन से हर व्यक्ति जुड़ा रहता है और चूँकि उसके परिणामों का प्रभाव हर व्यक्ति पर पड़ता है, अतः हर व्यक्ति को उसकी शर्तों को तय करने का अधिकार मिलना ही चाहिए। इसी आधार पर यह भी कहा जा सकता हैं कि जो व्यक्ति जितना गरीब है, उतनी ही अधिक जरूरत मताधिकार देने की है। कारण, हर उस समाज में, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति पर आधारित है, वहाँ मालिकों और मजदूरों के बीच सहजीवन की शर्तें प्रारम्भ से ही मजदूरों के प्रतिकूल तय होती है। यदि इस बात की गारंटी देनी है कि मजदूरों के कल्याण पर मालिकों का खतरा न मंडराए, तो उनके सहजीवन की शर्तों को निरन्तर पुनः पुनः तय करना ही होगा। परन्तु यह तभी संभव है, जब मताधिकार का नाता सम्पत्ति से तोड़ा जाए और उसे सभी सम्पत्तिविहीन वयस्कों से जोड़ा जाए। अतः स्पष्ट है कि दोनों ही दृष्टिकोणों से वयस्क मताधिकार का दम भरने वाला निष्कर्ष अकाट्य है। मैं उस निष्कर्ष को स्वीकार करता हूँ और सिफारिश करता हूँ कि 21 वर्ष से अधिक उम्र वाले सभी वयस्कों को, चाहे वे नर हों या नारी, मताधिकार प्रदान किया जाए।
- राजनीतिक न्याय ही वयस्क मताधिकार का एकमात्र आधार नहीं है। राजनीतिक औचित्य भी उसका समर्थन करता है। मुसलमान जैसे अल्पसंख्यक समुदाय सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों का आग्रह इस कारण भी करते हैं कि उन्हें इस बात की आशंका है कि संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में बहुसंख्यक समुदाय के मतदाता निर्वाचन पर इतना अधिक प्रभाव डालेंगे कि उन लोगों को चुन लिया जाएगा, जो अल्पसंख्यकों के दृष्टिकोण से अवांछनीय हैं। मैंने प्रतिवेदन में आगे कहा है कि ऐसी आशंका को वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करके कारगर ढंग से निर्मूल किया जा सकता है। बहुसंख्यकों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है कि वयस्क मताधिकार महत्वपूर्ण है और वह सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों का विकल्प है। बहुसंख्यकों का विचार है कि सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था एक अच्छाई है और उसे बनाए रखना उचित है। वे सोचते हैं कि वयस्क मताधिकार एक बुराई है और उस पर अंकुश लगना ही चाहिए। इस बारे में मेरा विचार इसके ठीक विपरीत है। मैं कहता हूँ कि सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था एक बुराई है और वयस्क मताधिकार एक अच्छाई। जो मुझसे सहमत हैं, वे मानेंगे कि वयस्क मताधिकार लागू किया जाए, केवल इसलिए नहीं कि वह एक सनातन अच्छाई है, बल्कि इसलिए भी कि यह हमें सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों की बुराई से मुक्ति दिलवाएगा। बल्कि वे लोग भी जिनकी राजनीतिक आस्था में वयस्क