32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मताधिकार के लिए कोई जगह नहीं है, उन्हें भी इस दृष्टिकोण को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। क्योंकि यह तो एक सीधी सी बात है कि बड़ी बुराई से छोटी बुराई कहीं भली और इसमें कोई संदेह नहीं कि वयस्क मताधिकार, यदि वह कोई बुराई है भी, सांप्रदायिक निर्वाचक मंडलों के मुकाबले छोटी बुराई है। वयस्क मताधिकार का समर्थन न केवल राजनीतिक न्याय अपितु राजनीतिक औचित्य भी करता है और जनमत का बहुत बड़ा अंश भी उसकी मांग कर रहा है। नेहरू कमेटी की रिपोर्ट भी वयस्क मताधिकार को लागू करने के पक्ष में है। उसमें ब्राह्मण से इतर तथा दलित वर्गों को छोड़कर भारत के सभी राजनीतिक दलों के दृष्टिकोणों का समावेश है। दलित वर्ग भी वयस्क मताधिकार पर आग्रह कर रहे हैं। सिंध मोहम्मडन एसोसिएशन, एक मुस्लिम सदस्य और बंबई सरकार के एक गैर - ब्राह्मण सदस्य ने भी इसका समर्थन किया है। इस तरह जनमत का एक बहुत बड़ा भाग वयस्क मताधिकार का समर्थन करता है। मेरे साथियों ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया है कि उन्होंने इस विशाल जनमत की क्यों अनदेखी की है।
ऐसा लगता है कि वयस्क मताधिकार के विरोध में मेरे साथियों के मन पर दो बातों ने भारी दबाव डाला है। एक तो देश में विद्यमान निरक्षरता का पैमाना है। देश में आम जनता निरक्षर है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। परन्तु इस तथ्य का मताधिकार के प्रश्न से कोई सरोकार है, इस दृष्टिकोण को मैं सही नहीं मानता। पहली बात तो यह है कि निरक्षर व्यक्ति की निरक्षरता उसकी कोई गलती नहीं है। बंबई सरकार काफी लंबे अर्से तक लोक शिक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य को अपने हाथ में लेने से इंकार करती रही है और जब उसने लिया, तो जानबूझकर ऐसी व्यवस्था की कि शिक्षा का लाभ केवल कुछ खास वर्गों को मिला और आम जनता उससे वंचित रह गई। *
1854 के बाद ही इस सरकार ने वर्ग - शिक्षण से हटकर जन - शिक्षण का समर्थन किया। लेकिन जन - शिक्षा के प्रसार में सरकार ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। उसने केवल कुछ प्रस्ताव पास कर दिए। शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता के रूप में सरकार ने सदा भारी कंजूसी बरती है। यह शरारत है, जो सरकार सदा कराधान के पक्ष में कर रही है, वह अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा के बारे में माननीय गोखले के उस प्रस्ताव को कैसे नकार सकती है, जिसमें कराधान का भी जिक्र था। सुधारों के कारण शायद ही कोई फर्क पड़ा हो। प्रेसिडेंसी में अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा अधिनियम पास होने के अलावा जन - शिक्षा की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई। इसके विपरीत, स्थानीय प्राधिकारियों को शिक्षा का कार्य सौंपे जाने से इसका स्तर गिरा है। इसकी व्यवस्था ऐसे लोगों के हाथ में चली गई है, जो अपेक्षाकृत या तो कोई दिलचस्पी नहीं लेते या
* कहीं ऐसा न हो कि इस तथ्य को अफसाना समझ लिया जाए। मैं बंबई प्रेसिडेंसी की 1850 . 51 की बोर्ड आफ एजूकेशन की रिपोर्ट के अंश प्रस्तुत करता हूँं। ये अंश रिपोर्ट के अंत में परिशिष्ट के पृष्ठ 118 . 122 में छपे हैं . संपादक