3. प्रांतीय विधायिका - Page 50

प्रांतीय विधायिका

इस क्षेत्र में अनभिज्ञ हैं। ऐसे लोग मुश्किल से ही शिक्षा सुधार में रुचि लेते हैं।

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  1. जहाँ तक दलित वर्गों को साक्षर बनाने का प्रश्न है, सच्चाई तो यह है कि उन्हें इससे वंचित रखा जा रहा है। उनकी शिक्षा के मार्ग में अस्पृश्यता एक ऐसी दीवार है, जिसे लांघा नहीं जा सकता। इसके आगे सरकार भी झुक गई है और उसने भारत में सामाजिक व्यवस्था की अपेक्षाओं की वेदी पर पब्लिक स्कूलों में दलित वर्गों के दाखिले के अधिकारों की बलि दे दी है। 1856 के प्रस्ताव में बंबई सरकार ने धारवाड़ के एक स्कूल में दाखिले के लिए एक महार लड़के की याचिका रद्द कर दी थी और कहा था : “पत्राचार में चर्चित प्रश्न में एक विकट व्यावहारिक कठिनाई है -

“1. इस बात में कोई शक नहीं कि अमूर्त न्याय महार याचिकादाता के पक्ष में

है। सरकार का विश्वास है कि जिन पूर्वाग्रहों ने उसको धारवाड़ में वर्तमान

शिक्षा साधनों के लाभ पाने से इस समय रोका है, हो सकता है कि उन्हें

बहुत पहले मिटा दिया गया हो।”

“2. लेकिन सरकार का यह दायित्व है कि वह इस बात को ध्यान में रखे कि

यदि वह युगों से चले आ रहे पूर्वाग्रहों को मिटाने के लिए किसी एक व्यक्ति

या कुछ लोगों के हित में तुरंत हस्तक्षेप करेगी तो शायद उससे शिक्षा के

ध्येय को भारी क्षति होगी। जिस असुविधा की चक्की में याचिकादाता पिस

रहा है, उसका सूत्रपात इस सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ है। वह ऐसी

असुविधा है जिसे सरकार उसके पक्ष में हस्तक्षेप करके तुरंत दूर नहीं कर

सकती, जैसी कि याचना उससे की है।”

26 साल बाद जो हंटर कमीशन बना, उसने यह अवश्य कहा कि सरकार इस सिद्धांत का पालन करे। किसी भी सरकारी कालेज या स्कूल में किसी को दाखिले के लिए केवल जाति के आधार पर इंकार न किया जाए। लेकिन उसने भी यह कहना जरूरी समझा था कि इस सिद्धांत का “समुचित सावधानी से पालन किया जाए”। इस सावधानी का नतीजा यह निकला कि उस सिद्धांत को लागू ही नहीं किया गया। 1921 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. परांजपे ने जरूर एक साहसिक कदम उठाया। परन्तु उनके इस कदम के पीछे कोई आधिकारिक आदेश नहीं था। इसलिए स्कूलों में दलित वर्गों के दाखिले के बारे में उनके परिपत्र की उपेक्षा की जा रही है। नतीजा यह है कि निरक्षरता अब भी दलित वर्गों के जीवन का दयनीय अंग बनी हुई है।

  1. अतः अक्सर उछाले जाने वाले इस सवाल के जवाब में कि निरक्षर लोगों को मताधिकार कैसे दिया जाए, मेरा उत्तर है कि उनकी निरक्षरता के लिए कौन जिम्मेदार है? यदि निरक्षरता का दायित्व सरकार का है, तो मताधिकार के लिए साक्षरता की शर्त रखना बहुसंख्य लोगों को मताधिकार से वंचित करना है। निरक्षरों का उसमें अपना कोई दोष नहीं क्योंकि उनके लिए जिस साक्षरता की व्यवस्था की गई, उसे प्राप्त करने का उन्हें कभी अवसर ही नहीं मिला। यदि इस बात को मान भी लिया जाए कि निरक्षरता दूर होने पर ही मताधिकारा मिलेगा, तो इसकी क्या गारंटी है कि