3. प्रांतीय विधायिका - Page 51

34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

निरक्षरता दूर करने के लिए यथाशीघ्र प्रयास किए जाएँगे? राष्ट्र निर्माण के अन्य प्रश्नों की भांति ही शिक्षा का प्रश्न भी अंततः धन के प्रश्न से जुड़ा है। जब तक पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं होता, शिक्षा का प्रसार भी नहीं हो सकता। यह धन कहाँ से आए, यह भी एक सवाल है और उसे हल किया जाना है। यह निर्विवाद है कि मौजूदा मता­ धिकार के जरिए जिस परिषद् का निर्वाचन होगा, वह कभी भी इस समस्या का हल नहीं खोज सकती। सीधी सी बात है कि शिक्षा के लिए धन धनवानों पर कर लगा कर ही प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान परिषद् पर धनवानों का ही नियंत्रण है। निश्चय ही धनवान उस समय तक निर्धनों के लाभ के लिए अपने ऊपर कर लगवाने पर राजी नहीं होंगे जब तक कि उन्हें विवश न कर दिया जाए। ऐसी विवशता की स्थिति तभी लाई जा सकती है, जब कि परिषद् के गठन में आमूल परिवर्तन हो। इससे वहाँ निरक्षरों तथा निर्धनों के पक्ष में भरपूर आवाज उठाई जा सकेगी। जब तक ऐसा नहीं होगा, निरक्षरता का प्रश्न कभी हल नहीं हो सकता। उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना घोर अन्याय की स्थिति पैदा करना है। पहले लोगों को निरक्षर रखना और फिर उनकी निरक्षरता को उन्हें मताधिकार से वंचित रखने का आधार बनाना घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। लेकिन वास्तव में यह समस्या इससे भी विकराल है। अपनी निरक्षरता को दूर करने का उनके पास एकमात्र उपाय मताधिकार है। उन्हें निरक्षर रखना उनकी निरक्षरता को सदा के लिए बनाए रखना है और उनके मताधिकार प्राप्ति के अवसर को अनन्त काल तक स्थगित करना है।

  1. कहा जा सकता है कि सवाल इस बात का नहीं है कि निरक्षरता के लिए कौन जिम्मेदार है। सवाल यह है कि क्या निरक्षर लोगों को मताधिकार प्रदान किया जाए। मेरा जवाब है कि यह साक्षरता या निरक्षरता का प्रश्न नहीं है। प्रश्न केवल बुद्धिमता का हो सकता है। जो साक्षरत को कसौटी मानने का आग्रह करते हैं और जो यह आग्रह करते हैं कि मताधिकार पाने से पूर्व साक्षर बनना होगा, वे मेरे विचार में दो गलतियाँ कर रहे हैं। उनकी पहली गलती यह मान्यता है कि एक निरक्षर व्यक्ति निश्चित रूप से बुद्धिमान नहीं हो सकता। परन्तु यह सर्वविदित है कि कोई निरक्षर व्यक्ति भी बहुत बुद्धिमान हो सकता है। यह कोई विरोधाभास नहीं है। वास्तव में अनुभवों से यह निष्कर्ष प्रमाणित हो जाएगा कि भारत सहित सारे संसार में निरक्षर व्यक्ति भी इतनी बुद्धि रखते हैं कि सोच समझ कर अपनी कामकाज चला सकें। बहरहाल कानूनी मान्यता है कि एक उम्र के बाद हर व्यक्ति में इतनी बुद्धिमत्ता आ जाती है कि वह अपना कामकाज संभालने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। मताधिकार के उपयोग में निरक्षर व्यक्ति आसानी से गलती कर सकता है, परंतु बंबई के विकास विभाग ने भी निर्णय की उतनी ही बड़ी गलतियाँ की हैं। भले ही उनके लिए वे निंदनीय हैं, परंतु साथ ही साथ उन्हें सहन किया जाता है। और भले ही वे उससे भी बड़ी गलतियाँ कर बैठें, बेहतर यही होगा कि उन्हें मताधिकार मिले। क्योंकि स्वतंत्र तथा जन - निर्वाचित सरकार के प्रति समूची आस्था का मूलाधार यह दृढ़ धारणा है