प्रांतीय विधायिका
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कि आजादी की गलतियों से कोई व्यक्ति जितना गंवाता है, उससे कहीं अधिक वह अनुभव से प्राप्त करता है। अतः समझ में नहीं आता कि जो सत्य अराजनीतिक क्षेत्र के व्यक्तियों के बारे में मान्य है, वह राजनीतिक क्षेत्र के बारे में मान्य क्यों नहीं होना चाहिए। उनकी दूसरी गलती यह मान्यता है कि निरक्षर की तुलना में साक्षरता साक्षर व्यक्ति को कहीं उच्च स्तर की बुद्धिमत्ता या ज्ञान अनिवार्यतः प्रदान करती है। इस संबंध में ब्राइस का कथन उद्धृत किया जा सकता है। ‘मार्डन डेमोक्रेसीज़’ (आधुनिक लोकतंत्रों) के अपने सर्वेक्षण में उन्होंने यह प्रश्न उठाया है कि पढ़ने व लिखने की योग्यता कहाँ तक नागरिक योग्यता में सहायक होती है और उसका उत्तर इस प्रकार दिया है : “व्यावहारिक दृष्टि से एकमात्र यही कसौटी उपलब्ध है, हम उसे पर्याप्त कसौटी मान लेते हैं। क्या वास्तव में ऐसा है भी? हममें से कुछ को स्मरण होगा कि इंग्लैंड में साठ वर्ष पहले देहात के लोग चतुर होते थे। वे अनपढ़ थे पर सहज बुद्धि के धनी थे। अपनी कुशाग्र बुद्धि और ठोस विवेक के आधार पर वे मतदान के लिए पूर्ण सक्षम थे, वैसे ही जैसे कि उनके नाती - पोते अखबार पढ़ने और सिनेमा देखने के बाद आज हैं - यूनानी मतदाता नागरिक मताधिकार के लिए अधिक सक्षम थे, आज के आधुनिक लोकतंत्रों के मतदाताओं से। इन यूनानी मतदाताओं ने और उनमें से कुछ ने तो राजनीति छपी या लिखी पुस्तक आदि से नहीं सीखी। बल्कि कुशल वक्ताओं को सुनकर और आपस में वार्ता द्वारा सीखी थी। पढ़ने से अधिक लाभ आपसी वार्ता से होता है। वार्ता में मन अधिक सक्रिय रहता है क्योंकि सुनते समय मस्तिष्क कम निष्क्रिय रहता है। चिन्तन का महत्व है, पढ़ने का नहीं। चिंतन से मेरा मतलब है तथ्यों को हृदयंगम करने की शक्ति और उसके आधार पर तर्क की शक्ति। बातचीत में बुद्धि की नोक - झोंक चलती है और उसके लिए कुछ मानसिक चेष्टा होती ही है। - लेकिन इस युग में चिन्तन का स्थान पठन ने ले लिया है। जो व्यक्ति केवल अपनी पार्टी का समाचार - पत्र पढ़ता है और अन्य प्रकार की खिचड़ी सामग्री के साथ राजनीति के उसके दांवपेचों का ज्ञान प्राप्त करता है और अपराधों और फुटबाल मैचों का विवरण पढ़ता है, वह यह जानने की कोशिश ही नहीं करता कि सवाल के दूसरे पहलू भी हैं और उनके बारे में कभी - कभार ही पूछता है। वह यह जानने की कोशिश ही नहीं करता कि जो कुछ अखबार में छपा है, उसके सबूत क्या हैं? चूंकि मुद्रित सामग्री किसी अज्ञात शक्ति की प्रतिनिधि दीख पड़ती है, अतः वह वार्ता में सुनी बात की अपेक्षा छापी गई बात पर अधिक सहजता से विश्वास कर लेता है। वह उसके ऐसे बयानों पर विश्वास कर लेता है जो शायद निराधार और मनगढ़ंत होते हैं। यदि वह वर्कशाप या आय - व्यय लेखा कार्यालय के अपने किसी साथी से उन्हें सुनेगा तो विश्वास नहीं करेगा। इसके अलावा ज्ञान तो ज्ञान है। उसके वृक्ष पर तो अच्छाई के फल भी होते हैं और बुराई के भी। यह जरूरी नहीं कि मुद्रित सामग्री में पाठक को सच अधिक मिले और झूठ कम। इसमें अपवाद वे पाठक होते हैं, जो विशद अध्ययन करते हैं और विवेक क्षमता रखते हैं। पार्टी का मुखपत्र कुछ तथ्यों को दबा देता है