36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
और कुछ को तोड़ - मरोड़ कर पेश करता है। अतः वह सबसे घटिया मार्गदर्शक है, क्योंकि असत्य को बार - बार लगातार दोहरा कर वह अधिक प्रभाव डाल सकता है। कोई व्यक्ति या संस्था उतना प्रभाव नहीं डाल सकती। मुद्रण के आविष्कार से पूर्व आध्यात्मिक फतवों से लैस केवल धर्मोपदेशक ही इतना प्रभाव डाल सकते थे। केवल अपनी पार्टी के समाचार - पत्रों से मार्गदर्शन ग्रहण करने वाले आधुनिक मतदाता की दशा अपने दादा से बेहतर नहीं है। आज से 80 वर्ष पूर्व उसका दादा अपने जमींदार अथवा नियोजक के और आयरलैंड में अपने पुरोहित के इशारे पर वोट देता था। कम से कम दादा इस बात से तो अवगत होता था कि वह किसका अनुयायी है, जबकि समाचार - पत्र में विवाद के केवल एक पक्ष को पढ़ने वाला उसक पौत्र स्वार्थी तत्वों के भ्रमजाल में फंस जाता है। अपने भोलेपन के कारण वह मुखपत्रों के मालिकों के इस भ्रमजाल को लोकमत अथवा लोक - कल्याण मान बैठता है। इस प्रकार कोई लोकतंत्र जिसमें केवल पढ़ने की शिक्षा दी जाती है, चिंतन और मनन की नहीं, वह केवल पढ़ने की योग्यता के बल पर उच्च कोटि का तो नहीं हो जाएगा।”
- मुझे ऐसा लगता है कि आम भारतवासी की निरक्षरता के सवाल को जरूरत से ज्यादा उछाला जा रहा है। इंग्लैंड के मतदाता को लीजिए और मतदाता के रूप में उसके आचरण को देखिए। हम क्या पाएंगे? उसके बारे में ‘‘टाइम्स’’ के 21 अगस्त 1924 के साहित्यिक परिशिष्ट में यह छपा है :
‘‘अधिकांश लोगों को इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं होती। केवल उन्हीं के
मतों से राजनीतिक मसले तय होते हैं, परन्तु वे राजनीतिक के बारे में कौरे हैं।
यह एक क्षोभकारी पर सुस्थापित आलोचना है कि प्रशुल्क सुधार और कराधान,
या विदेश नीति संबंधी निर्णय में उन लोगों का हाथ होता है, जिन्होंने जीवन
भर गंभीर राजनीति पर दर्जन भर स्तम्भ भी नहीं पढ़े होंगे। आठ साल पहले
के पुराने संकीर्ण मतदाताओं में से कम से कम दो-तिहाई ने सामयिक
मसलों पर राजनीतिक भाषण बड़े चाव से पढ़े थे। आज उनकी संख्या
पांच प्रतिशत भी नहीं है, जो वाद - विवाद या अग्रलेख पढ़ते हैं। शेष कितने भी
मेधावी हों पर उनकी संख्या नगण्य है। समग्र रूप से लोकतंत्र बौटिल्स की शांति
कुत्सित एवं अश्लील मनोरंजन से संतुष्ट है। उसी की भांति वह अपनी अक्ल
अपने समाचार - पत्र के हवाले कर देता है, जो उसके रविवारों को कहीं अधिक
विकृत एवं घटिया बना देता है। इतने विकृत रविवार तो उसने अपने बैपटिस्ट मंत्री
के अधीन भी नहीं बिताए थे। यह है वह वातावरण जिसकी जहरीली गैसों से अपनी
संस्कृति को बचाने का व्यर्थ प्रयास स्कूल करते हैं।’’
- निश्चय ही यदि ब्रिटिश लोकतंत्र अर्थात् ब्रिटिश साम्राज्य उक्त प्रकार के वोटरों के शासन से संतुष्ट है, तो यह दलील दी जा सकती हैं कि वयस्क मताधिकार का विरोध करने वाले भारतीय केवल अन्यायी और स्वप्नदर्शी है, बल्कि वे जरूरत से ज्यादा विरोध कर रहे हैं। उन पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे जनसाधारण की