3. प्रांतीय विधायिका - Page 54

प्रांतीय विधायिका

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निरक्षरता की आड़ में राजनीतिक सत्ता हड़पना चाहते हैं। यह आग्रह किया जाता है कि राजनीतिक विचारधाराओं की सूक्ष्मताओं का विशद ज्ञान और उनमें भेद करने की क्षमता राजनीतिक सूझबूझ की जरूरी कसौटियां हैं। इसे कम से कम बाल की खाल निकालना तो कहा ही जा सकता है। किसी भी मतदाता को चाहे वह किसी भी देश का हो, छोटे - छोटे राजनीतिक मसलों के बारे में कभी भी ठीक - ठीक जानकारी नहीं दी जा सकती। न ही ऐसा सूक्ष्म ज्ञान जरूरी है। मतदाता से अधिक से अधिक यह अपेक्षा की जा सकती है कि उसमें मोटे मसलों को समझने की शक्ति हो। वह ऐसे उम्मीदवार का चयन कर सके, जो उसकी राय में उसका हित साधन कर सके। मैं दावे से कह सकता हूँ कि औसत भारतीय में यह क्षमता है।

  1. व्यस्क मताधिकार को अस्वीकार करने के लिए मेरे साथियों ने जिस दूसरी बात को प्रमुखता दी, वह है इंग्लैंड जैसे देशों का उदाहरण। उनकी दलील है कि 1429 में 40 शिलिंग पूर्ण स्वामित्व वाला मताधिकार था। उसका विस्तार करके 1832 में उसे वयस्क मताधिकार में परिणत कर दिया गया। उस समय 5 लाख से भी कम व्यक्तियों को संसद - सदस्यों के निर्वाचन के लिए वोट देने का अधिकार था। लेकिन उस साल के कानून के अनुसार मतदाताओं की संख्या बढ़ाकर लगभग 1000,000 कर दी गई, 1867 तक मताधिकार की सीमा घटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1867 के कानून द्वारा यह संख्या बढ़ाकर 2500,000 कर दी गई। इसके 17 साल बाद जब 1884 का कानून बना तो यह संख्या बढ़ाकर फिर 5500,000 कर दी गई। फिर अगले 34 साल तक तब तक वयस्क मताधिकार नहीं दिया गया, जब तक कि 1918 का लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम पारित नहीं हुआ। राजनीतिज्ञों का एक ऐसा वर्ग है, जो सामाजिक क्षेत्र में घोर अनुदार और राजनीतिक क्षेत्र में आमूल परिवर्तनवादी है। वह उक्त तथ्य का इस्तेमाल अपनी इस दलील के समर्थन में करता है कि विधायिका को पूर्ण सत्ता दी जा सकती है, भले ही वह पूरी तरह प्रतिनिधि विधायिका न हो। अपने विरोधियों के दलील के उत्तर में भी वह उक्त तथ्य प्रस्तुत करता है। विरोधी कहते हैं कि इतने सीमित प्रतिनिधित्व वाली विधायिका को सत्ता सौंपना अल्पतंत्र को सत्तारूढ़ करना होगा। दूसरे लोग अपनी दलील इस तरह पेश करते हैं कि मताधिकार के मामले में हम धीरे - धीरे ही कदम उठाएं, जैसाकि अन्य देशों में हुआ है। दूसरे वर्ग के लोगों की आलोचना के बारे में मेरा उत्तर है कि हम इसी खास मामले में ही अंग्रेजों के पिछलग्गू क्यों बनें? यह पक्की बात है कि अंग्रेजों ने अपने देश में मताधिकार के विषय में कोई सिद्धान्त निश्चित नहीं किए थे। जहां तक प्रश्न है कि वहां मताधिकार का विस्तार लम्बे - लम्बे अंतरालों के बाद हुआ, तो इसके पीछे तो अंग्रेजों के सत्तारूढ़ वर्ग की स्वार्थी प्रवृत्ति थी। साथ ही इस बात का भी कोई औचित्य नजर नहीं आता कि हम भी उतने ही चरणों से होकर गुजरें जितनों से दूसरे देश गुजरे हैं और हम भी वैसा ही ड्रामा करें। ऐसा करने का मतलब हुआ कि उस लाभ को ठुकरा दिया जाए,