38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
जो बाद में जन्म लेने वालों के लिए सदा ही सुलभ होता है। दूसरे वर्ग की आलोचना का मेरा उत्तर है कि तथ्य के रूप में उनका कथन सही है। उस समय भी संसद ने प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्य की पूर्ण शक्तियों का उपयोग किया, जब उसने जनसंख्या के अल्प प्रतिशत का प्रतिनिधित्व किया। परन्तु प्रश्न यह है कि राष्ट्र को क्या परिणाम भुगतना पड़ा? लार्ड शैफ्टसवरी ने सुधारविहीन संसद द्वारा रचे गए सामाजिक विधान के इतिहास का वर्णन किया है। जो व्यक्ति उस इतिहास से परिचित है, वह कभी नहीं चाहेगा कि इस देश में उस प्रयोग को दोहराया जाए। यह परिणाम इंग्लैंड में प्रचलित सीमित मताधिकार का अनिवार्य परिणाम था। इन आलोचकों ने जिन तथ्यों पर बल दिया है, वे मेरे विचार में सीमित मताधिकार पर टिकी सरकार का समर्थन नहीं करते। ऐसी सरकार इस दृष्टि से निम्नन्तर श्रेणी की सरकार है कि वह अल्पतंत्र के शासन को बढ़ावा देती है। संयुक्त रिपोर्ट तैयार करने वालों ने तो ऐसे परिणाम की कभी कल्पना तक नहीं की थी। वस्तुतः इस बुराई के प्रति वह इतने सजग थे कि अपनी रिपोर्ट के पैरा 262 में उन्होंने खासतौर पर कहा कि विचारार्थ विषयों में कानूनी कमीशन को मताधिकार तथा निर्वाचन क्षेत्रों के गठन पर भी विचार करना चाहिए। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखने का महत्वपूर्ण विषय भी इसमें शामिल होना चाहिए। ‘‘दरअसल हम मानते हैं कि विस्तृत मताधिकार वह आधार है, जिस पर स्वराज की इमारत खड़ी होनी ही चाहिए। हमारा कोई इरादा नहीं कि हमारे सुधारों की परिणति केवल यह हो कि हम नौकरशाही के स्थान पर अल्पतंत्र के हाथ में सत्ता दें।’’
- लेकिन इसका इलाज क्या है कि देश में अल्पतंत्र न आए? जहां तक मैं समझता हूँ, इसका एकमात्र उपाय वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करना है। यह कहना संगत ही होगा कि 1928 के श्रीलंका आयोग के सदस्य भी संयुक्त रिपोर्ट तैयार करने वालों की भांति इस बारे में सजग थे, ‘‘अल्पसंख्या वाले इन मतदाताओं को एक उत्तरदायी सरकार प्रदान करने का अर्थ होगा सत्ता अल्पतंत्र को सौंप दी जाएगी और इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि शेष लोगों के हितों के बारे में सत्तारूढ़ लोग परामर्श करेंगे’’। उन्होंने यह कहना जरूरी समझा, ‘‘महामहिम की सरकार न केवल श्रीलंका के धनी तथा अधिक उच्च शिक्षा प्राप्त वर्गों की न्यासी है, बल्कि किसान, कुली एवं उन सभी निर्धन वर्गों की भी है जो बहुसंख्यक हैं।’’ उनकी मान्यता थी, ‘‘यदि बहुसंख्य वर्ग के हितों को अल्पसंख्य वर्ग के निरंकुश नियंत्रण में सौंप दिया गया, तो वह विश्वासघात होगा।’’ उनका निष्कर्ष था, ‘‘राज्य - परिषद के निर्वाचन में मतदाताओं के लिए साक्षरता की शर्त नहीं होनी चाहिए।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारे विचार में उत्तरदायी सरकार के विकास के लिए जरूरी है कि जन - साधारण को और अधिक अवसर दिया जाए कि वह सरकार पर प्रभाव डाल सके। यह उचित भी है और विवेकपूर्ण भी, कि मताधिकार को शिक्षित वर्गों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।’’ यदि श्रीलंका के लिए वयस्क मताधिकार का सुझाव दिया जा सकता है, तो