प्रांतीय विधायिका
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भारत के लिए क्यों नहीं? यह एक सहज प्रश्न है। साथ ही दोनों देशों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक अवस्थाएं एक - दूसरे से इतनी अधिक मिलती - जुलती हैं कि मताधिकार के मामले में दोनों में अंतर करना भेदभावपूर्ण होगा, जबकि इस अंतर को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता समानता को छोड़ भी दें, तो केवल गुण - दोषों के आधार पर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि दोनों में किसी एक को वयस्क मताधिकार के प्रयोग के लिए अधिक उपयुक्त समझा जाए तो वे हैं भारत के लोग और खासतौर से उस बंबई प्रेसिडेंसी के लोग जहां ग्राम पंचायतों में वयस्क मताधिकार प्रणाली से ही प्रचलन में है।
अध्याय 2
निर्वाचन - क्षेत्र
- मौजूदा विधान परिषद् में 114 सदस्य हैं। इनमें से 26 मनोनीत हैं और 86 निर्वाचित हैं। मनोनीति सदस्यों की दो श्रेणियां हैं : (क) श्रेणी में सरकारी सदस्य हैं, जो सरकार के आरक्षित पक्ष के आधे का प्रतिनिधित्व करते हैं; (ख) श्रेणी में वे गैर - सरकारी सदस्य हैं जो (1) दलित वर्ग, (2) श्रमिक वर्ग, (3) आंग्ल - भारतीयों, (4) भारतीय ईसाइयों तथा (5) कपास के व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। निर्वाचित सदस्यों में से (1) कुछ को वर्गीय निर्वाचन - क्षेत्रों से चुना जाता है, जो जमीदारों, वाणिज्य तथा उद्योग के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बनाये गये हैं, (2) कुछ को आरक्षित निवार्चन - क्षेत्रों से चुना जाता है, जो मराठा और सम्बद्ध जातियों तथा शेष जातियों के लिए होते हैं, (3) कुछ को सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों से चुना जाता है, जो मुसलमानों तथा यूरोपीयों के लिए बनाये गए हैं। प्रश्न यह है कि क्या निर्वाचन के इस ढांचे को बिना परिवर्तन के यूं ही चलने दिया जाए? किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह जरूरी है कि इस पर सैद्धांन्तिक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए।
मनोनीत सदस्य
- जहां तक मनोनीत सदस्यों का सवाल है, यह कहा जाता है कि परिषद में उनका रंगरूप प्रतिनिधि के रूप से कोसों दूर होता है। जिस प्रकार उत्तरदायी स्वशासन का मूलमंत्र होता है कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी हो, ठीक उसी प्रकार प्रतिनिधि - शासन का मूलमंत्र होता है कि विधायिका जनता के प्रति उत्तरदायी हो। ऐसा उत्तरदायित्व तभी मिल सकता है, जब विधायिका का निर्वाचन जनता करे। मनोनयन प्रणाली न केवल सदन के प्रतिनिधि - स्वरूप को डस लेती है, अपितु कार्यपालिका को अनुत्तरदायित्व की ओर धकेलती है। कार्यपालिका की सलाह पर ही मनोनयन के अधिकार का प्रयोग किया जाता है। उसके बल पर वह विधायिका के कोई 25 प्रतिशत सदस्यों को नियुक्त कर लेती है। इसका परिणाम यह होता है