40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कि सदन के अधिकतर भाग की स्थिति सेवकों की हो जाती है, आलोचकों की नहीं। मनोनीत गैर - सरकारी सदस्य सरकार के सेवक नहीं होते, यह कहने से इस दृष्टिकोण का महत्व कम नहीं हो जाता। क्योंकि मनोनीत गैर - सरकारी सदस्यों को कभी भी
खरीदा जा सकता है और कार्यपालिका के पास ऐसे अनेक तरीके हैं, जिनके द्वारा वह निर्वाचित सदस्य पर प्रभाव डालकर उनकी आजादी को खरीद सकती है। उनमें से कुछ तरीके हैं कि किसी सदस्य को उपाधियों और सम्मान से अलंकृत कर दिया जाए या उसके दोस्तों तथा रिश्तेदारों को संरक्षण प्रदान कर दिया जाए। लेकिन मनोनीत गैर - सरकारी सदस्यों की ऐसी दयनीय आश्रित स्थिति होती है कि कार्यपालिका को उन्हें खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती। उनके पास कोई स्वाधीनता होती ही नहीं कि उसे बेचा जाए। वे कार्यपालिका के पुतले हैं और उन्हें शर्त नहीं तो किसी वायदे पर ही स्थान दिया जाता है कि वे कार्यपालिका के सहयोगी के रूप में कार्य करें। न ही कार्यपालिका मनोनीत सदस्यों के आगे असहाय है। कार्यपालिका वायदे से मुकरने का साहस कर सकती है। कार्यपालिका को पुनःमनोनयन का अधिकार है और वह उसका पुनःमनोनयन न करके कठोरतम दंड दे सकती है और ऐसी मिसाल हैं जहां उसने ऐसा दंड दिया है। सम्राट के वीटो अधिकार की भांति ही पुनःमनोनयन का अधिकार है। इसलिए हर मनोनीत सदस्य दुम दबाकर रहता है और कार्यपालिका के इशारों पर नाचता है।
मनोनयन प्रणाली का एक और दोष सामने आता है। मनोनीत गैर - सरकारी सदस्य कतिपय समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन समुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए जो निर्वाचन प्रणाली तैयार की गई, वह पर्याप्त नहीं समझी जाती। मनोनीत सरकारी सदस्य तो सरकार के हितों के समर्थन के लिए नियुक्त किए जाते हैं। खेदजनक बात यह है कि जहां मनोनीत सरकारी सदस्य सरकार के हितों का पोषण करते हैं, वहां मनोनीत गैर - सरकारी सदस्य अपने उन वर्गों के हित का पोषण नहीं कर पाते, जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तव में एक मनोनीत गैर - सरकारी समुदाय की कोई सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि अक्सर सरकार पर दबाव डाल कर ही समुदाय का हितसाधन किया जा सकता है। यह तभी संभव है, जब कार्यपालिका की बराबर आलोचना की जाए और उसे विपक्ष के मत पड़ने के परिणामों का अहसास हो। परन्तु मनोनीत सदस्य के हाथ में यह साधन नहीं है, क्योंकि उसका अस्तित्व ही ऐसा है। उसके कारण कार्यपालिका को उसके समर्थन का भरोसा रहता है और वह उसके हित के प्रति उदासीन रहता है। मनोनीत सदस्य को काई आजादी नहीं मिलती। अतः वह उन लोगों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं करा सकता जिनका वह प्रतिनिधि कहलाता है। इस तरह मनोनयन द्वारा किया गया प्रतिनिधित्व कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता, वह तो निरा नाटक होता है।
मनोनयन प्रणाली का एक गंभीर दोष यह है कि मनोनीत गैर - सरकारी सदस्य