प्रांतीय विधायिका
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मंत्री पद के हकदार नहीं हो सकते। सिद्धान्त रूप में कोई बंधन नहीं होना चाहिए कि विधायिका के किसी सदस्य को किसी प्रशासन का मंत्री चुने जाने का अधिकार नहीं है। ऐसी धारणा यदि है भी कि ऐसे अधिकार की सीमाएं हैं, तो वे सीमाएं अच्छे और दक्ष प्रशासन के हित में होनी चाहिए। केवल यही बात नहीं है कि सीमाओं का यह प्रयोजन नहीं है। यह प्रतिबंध विभिन्न समुदायों पर उनके प्रतिनिधित्व की शैली में अंतर के कारण अलग - अलग प्रभाव डालता है, उन कतिपय समुदायों पर भी जिन्हें इस प्रतिबंध से मुक्त रहना चाहिए। दलित वर्ग जैसे कुछ समुदायों को अपने कल्याण के लिए सरकार की सीधी कार्रवाई की बहुत जरूरत है। यह हकीकत है कि सरकार के भरसक प्रयास के बाद भी उनके हालात पूरी तरह और शीघ्र ही सुधर नहीं सकते। लेकिन इसके बावजूद यह निर्विवाद है कि बुद्धिमत्तापूर्ण विधान लोगों के लिए अति लाभकारी होगा। दरअसल ये सभी वर्ग आजन्म रूढि़गत बुराइयों तथा सामाजिक विषमताओं की चक्की में पिसते रहते हैं। उसका दायित्व समाज पर है। उससे छुटकारा दिलाने के लिए विधान बहुत कुछ कर सकता है। लोगों के हालात बदलने के लिए कानून की क्या भूमिका है, इसे तो समूची दुनिया जानती है। लेकिन सामाजिक प्रगति के लिए यह कर्तव्य तब तक समझ में नहीं आ सकता, जब तक कि दलित जातियों में से किसी व्यक्ति को देश की मंत्री परिषद् में शामिल नहीं किया जाता। इसलिए मनोनयन प्रणाली की निंदा की ही जानी चाहिए। इसका एकमात्र प्रभाव यह पड़ा है कि उसने ऐसे लोगों की जमात खड़ी कर दी है कि जो निर्वाचकों के बजाए पद प्राप्ति की ही चिन्ता में लगे रहते हैं।
निर्वाचित सदस्य
- वर्गीय निर्वाचन . क्षेत्र : यह मार्ले - मिंटो सुधारों की विरासत है। मार्ले - मिंटो योजना एक छलावा थी, क्योंकि उसके अनुसार नौकरशाही ने ऐसी जोड़तोड़ करने का प्रयास किया कि उनकी हुकूमत भी बनी रहे और मताधिकार तथा निर्वाचन - क्षेत्रों का आयोजन इस प्रकार किया जाए कि विधान - मंडलों को लोक राज का मुखौटा पहना दिया जाए। ऐसी योजना लागू करने के लिए ये वर्गीय निर्वाचन - क्षेत्र अति अनुकूल थे। परन्तु मांटेग्यू - चेम्सफोर्ड योजना छलावा नहीं थी। उसमें लोक राज की कल्पना थी। अतः आशा की जाती थी कि ऐसे वर्गीय निर्वाचन - क्षेत्रों को समाप्त करने का सुझाव दिया जाएगा। लेकिन इन वर्गों के जोरदार प्रभाव के कारण रिपोर्ट तैयार करने वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया गया कि वे इन निर्वाचन - क्षेत्रों को बनाए रखे जाने की सिफारिश करें। साउथबरो कमेटी ने इस सिफारिश को मूर्त रूप दिया। इन वर्गीय निर्वाचन - क्षेत्रों को बनाए रखने का कोई भी कारण क्यों न रहा हो, इसमें कोई शक नहीं कि यह लोक राज की मूल भावना के विपरीत है। इसका वर्गीय रूप ही इसको ठुकरा दिए जाने का एक पर्याप्त कारण है। विधायिका जैसी विचारशील सभा में जहां लोकहित के मामलों पर लोकमत के आधार पर निर्णय होता है, उसके