42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
लिए यह निहायत जरूरी है कि परिषद् के जो सदस्य निर्णय में भाग लें, वे लोकमत के प्रतिनिधि हों। वास्तव में उनके अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति को सदन में चर्चित मसलों पर निर्णायक वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए। लेकिन वर्ग हितों के प्रतिनिधि तो केवल अपने वर्ग के मतों तथा पूर्वाग्रहों को प्रस्तुत करते हैं। अतः उन्हें तो ऐसे मसलों के निर्णय में भाग लेने का अधिकार कदापि मिलना ही नहीं चाहिए जिनका संबंध उनके वर्ग के हितों से न हो। वर्गीय स्वरूप होने पर भी विधायिका के सदस्य होने के नाते वे उन सभी मुद्दों पर मतदान करते हैं, जिनका उनके वर्ग से कुछ लेना देना नहीं। मेरे विचार में यह लोकराज के सिद्धान्त के नितांत प्रतिकूल है। यह दलील दी जा सकती है कि ऐसे वर्ग - हितों के प्रतिनिधि ऐसे वर्गीय विषयों पर अपनी राय विशेष रूप में दे सकते हैं, जिनके बारे में वर्गेतर सदन को जानकारी नहीं होती, लेकिन यह याद रखने की बात है कि लोकतंत्र का सर्वोच्च सिद्धान्त है स्वराज और इसके लिए यह जरूरी है कि सभी मसलों पर अंतिम निर्णय जन - निर्वाचित सदस्यों के द्वारा किया जाए, न कि विशेषज्ञों के द्वारा। फिर भी यह उचित नहीं है कि सदा ही ऐसे लोगों की सलाह का सदन में कोई मूल्य ही नहीं होता क्योंकि उनकी सलाह सदा ही वर्ग - विचारधारा का विशद विवेचन होती है, न कि विवादास्पद सूत्र का संभल - संभल कर किया गया विवेचन।
- यह मान लेने पर भी कि इन वर्गों के हितों की रक्षा के लिए और उनकी ओर से सदन को सलाह देने के लिए यह जरूरी है, यह सिद्ध करना होगा कि सामान्य निर्वाचन - क्षेत्रों के जरिए इन हितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकेगा। जो तथ्य हमारे सामने हैं, उनको देखते हुए तो ऐसा लगता है कि उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल सकता है। इनामदारों के ही मामले को लें। उनके अपने विशेष निर्वाचन-क्षेत्रों के जरिये उन्हें तीन स्थान दिए गए हैं, फिर भी आम निर्वाचन-क्षेत्रों के जरिए उन्हें 12 स्थान मिल सके हैं। दरअसल, परिषद् में अन्य जमींदार सदस्यों के साथ सदन में अपनी एकजुटता के बल पर संख्या की दृष्टि से वे अपने आपको इतना सुदृढ़ समझते हैं कि केवल कुछ महीने पहले ही उन्होंने अपने वर्ग के नेता के लिए एक मंत्री पद की मांग की। साथ ही यह भी सच नहीं है कि वर्गीय निर्वाचन - क्षेत्रों के अभाव में परिषद् में इन वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा। उस वर्ग का सदस्य भी उनके हितों का संरक्षण कर सकेगा, भले ही उसका चुनाव आम निर्वाचन - क्षेत्र से हुआ हो। यह बात स्पष्ट हो जाएगी, यदि हम ध्यान दें कि जो सदस्य विधायिका में स्थान पाता है, भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से अपने निर्वाचन - क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, फिर भी वह अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं अपना और उस हद तक अपने वर्ग का भी प्रतिनिधित्व करता है। वास्तव में मानव प्रकृति के अनुसार ‘स्व’ का अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्व करने की किसी सदस्य की यह प्रवृत्ति स्वयं को इतनी दृढ़ता से उजागर करती है कि वह प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व को महत्वहीन बना देती है और उसे ऐसा करना भी चाहिए। यथा, कोई