3. प्रांतीय विधायिका - Page 60

प्रांतीय विधायिका

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भी इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि वाणिज्य-मंडल का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई यूरोपीय सज्जन केवल वाणिज्य के हितों का ही प्रतिनिधित्व करेगा और वह यूरोपीय समाज के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा, क्योंकि उसे वाणिज्यमंडल ने चुना है, सामान्य यूरोपीय समाज में नहीं। यह स्वाभाविक बात है कि किसी व्यक्ति का ‘स्व’ का क्षेत्र उसके निर्वाचन - क्षेत्र से अधिक निकट होता है। एक आम कहावत है कि कमीज की अपेक्षा किसी व्यक्ति की खाल उसके अधिक निकट होती है और यही बात विधायिका के सदस्यों पर भी लागू होती है। इसमें उनकी नेकनीयती पर कोई छींटाकशी नहीं है। इस तथ्य की अनुमति होने पर अंग्रेजों ने वर्गीय निर्वाचन-क्षेत्रों पर विचार त्याग दिया। अंग्रेजों की भी कभी यह इच्छा थी कि हाउस ऑफ कामन्स में जहाजरानी व्यवसाय, ऊनी वस्त्र व्यवसाय और लिनेन व्यवसाय के अलग - अलग प्रवक्ता हों। मेरी समझ में यह नहीं आता कि जब अन्यत्र इस व्यवस्था को तज दिया गया है, तो उसे भारत में क्यों जारी रखा जाए? इन वर्गों का तो इससे कोई हितसाधन नहीं होता। यह राज्य व्यवस्था के लिए भी हानिकर है। प्रश्न केवल यह है कि व्यावसायिक और विशिष्ट वर्गों के प्रतिनिधि आम निर्वाचन - क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकते हैं या नहं। किसी बात की मुझे तो ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जो इन वर्गों के लिए निर्वाचन की दौड़ में कोई दिक्कत पैदा कर सकेगी। ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। आम चुनाव में सरदारों तथा इनामदारों की सफलता इसे सिद्ध कर चुकी है। जब इनामदार और सरदार चुने जा सकते हैं तो फिर व्यवसाय और उद्योगों के प्रतिनिधियों के लिए क्या कठिनाई है।

  1. आरक्षित निर्वाचन . क्षेत्र : आरक्षित निवार्चन - क्षेत्र प्रणाली के विरुद्ध तीन तर्क दिए जा सकते हैं। एक यह है कि यह बहुसंख्यकों को निर्वाचन का लाभ देना चाहती है। यह तय है कि प्रेसिडेंसी के मराठीभाषी क्षेत्र में मराठा और उनसे सम्बद्ध जातियों को जनसंख्या और मतसंख्या की दृष्टि से बहुमत प्राप्त है। इसलिए उन्हें किसी रा­ जनीतिक संरक्षण की जरूरत नहीं है, परंतु इस बात का अनुभव किया जाना चाहिए कि एक शक्ति वह होती है जिसे अपनी शक्ति का ज्ञान और भान होता है। दूसरी शक्ति वह होती है, जो इतनी सुप्त तथा दबी होती है कि उसके शक्तिधारियों को पता ही नहीं होता कि उसका उपयोग किया जा सकता है। दोनों में आकाश - पाताल का अंतर होता है। मराठों तथा सम्बद्ध जातियों को उनकी शक्ति का ज्ञान नहीं है, यह बात उस समय काफी स्पष्ट हो जाती है, जब हम मराठों तथा सम्बद्ध जातियों की मतसंख्या की तुलना उन निर्वाचन - क्षेत्रों में जहां उनके लिए सीटों का आरक्षण है, चुनाव लड़ने वाले विभिन्न उम्मीदवारों के बीच उनके प्रतिनिधियों की स्थिति से करते हैं। इनमें से प्रत्येक निवार्चन-क्षेत्र में मराठा मतदाताओं की संख्या अन्य जातियों के मतदाताओं से बढ़कर है। इसके बावजूद 1923 और 1926 के चुनावों में उनके लिए नियत सात सीटों में से वे तीन पर विजयी नहीं हो सकते थे, यदि ये सीटें उनके लिए आरक्षित न की जातीं। दरअसल यह आश्चर्य की ही बात है कि मतदाता सूची में जिस जाति के उम्मीदवारों की संख्या सबसे अधिक है, प्रतिनिधित्व की दृष्टि से उसका स्थान