44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
लगभग सबसे नीचे यानी रसातल में है। इस आश्चर्यजनक तथ्य से यह प्रकट होता है कि इस बहुसंख्य जाति को अपनी शक्ति का ज्ञान व भान नहीं है। उस पर कोई बाहरी प्रभाव पड़ रहा है।
- आरक्षित स्थान प्रणाली से विशेष रूप से प्रभावित होने वाले उच्च वर्गों के लोगों का दूसरा एतराज यह है कि यह प्रणाली उनके लिए अन्यायपूर्ण है, क्योंकि वे सीधी चुनावी लड़ाई में चुनाव नहीं जीत पाते। यह सत्य है कि इस ‘प्रतिनिधित्व के अधिकार’ में सामान्य और विशेष प्रणाली के कारण ऊँची जातियों पर यह अंकुश लगा हुआ है कि उन्हें नीची जातियों का प्रतिनिधत्व करने का अधिकार नहीं है, पर इसका क्या कोई कारण है कि प्रतिनिधित्व के सामान्य अधिकार से भिन्न ‘प्रतिनिधत्व के विशेष अधिकार’ को निरंकुश अधिकार बना दिया जाए? आधुनिक राजनेताओं ने अपनी पूरी प्रतिभा मताधिकार पर प्रतिबंध लगाने का कारण खोजने में खपा दी है। मेरी दृष्टि से इस बात की और अधिक आवश्यकता है कि हम दूसरों का प्रतिनिधित्व करने के किसी उम्मीदवार के अधिकार पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास क्यों करें। इस बात में कोई तुक नजर नहीं आती कि प्रतिनिधित्व अधिकार के निहित अर्थों में उसे स्वीकार करने की शर्त की व्याख्या क्यों न की जाए। यह अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा कि विधायिका के लिए चुने जाने के लिए कुछ शर्तें हों, उदाहरणार्थ, किसी स्थानीय प्राधिकरण में कुछ वर्षों की सेवा की गई हो और जो शर्त पूरी न कर पाएं, उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी जाए। यह मान्यता पूरी तरह न्यायसंगत होगी कि परिणामों की दृष्टि से विधायिका का सेवा कार्य इतना महत्वपूर्ण है कि इससे पूर्व कि प्रतिनिधित्व के दावे को स्वीकार किया जा सके, रुचि तथा अनुभव का प्रमाण देना ही होगा। ऊंची जातियों द्वारा नीची जातियों का प्रतिनिधित्व किए जाने के अधिकार को सीमित करने संबंधी तर्क में यही कसौटी अपनाई गई है। प्रतिनिधित्व के अधिकार की मान्यता से पूर्व उसमें केवल यह शर्त रखी गई है कि समाज की ओर कुछ रुझान होना चाहिए। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि अपेक्षा अनावश्यक है। क्योंकि उम्मीदवार जिस जनसमूह का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, उसके प्रति उसका सामाजिक रवैया, रुचि और अनुभव से अधिक महत्वपूर्ण है। वास्तव में तो केवल रुचि और अनुभव विनाश का कारण होंगे, यदि उनके साथ सही प्रकार के सामाजिक रवैये का गठबंधन और अंकुश नहीं होगा। इस बात में कोई शक नहीं है कि ऊंची जातियों का सामाजिक बर्ताव नीची जातियों के साथ सही नहीं है। यह भी संदेह की बात नहीं है कि इन जातियों की प्रशंसा में देश में सदा - सर्वदा यह कहा जाता है कि बौद्धिक रूप से वे भारत की अत्यधिक शक्तिशाली जातियां हैं। पर इतना ही सच यह भी है कि उन्होंने अपनी बौद्धिक शक्तियों का सदुपयोग कभी भी नीची जातियों के हित में नहीं किया, बल्कि उन्होंने जनसाधारण से सदा घृणा की है, उन्हें अपमानित और बहिष्कृत किया है और भले ही उन्हें अपने से भिन्न जाति का न माना हो पर भिन्न वर्ग का तो माना ही है। किसी भी वर्ग को दूसरे वर्ग पर शासन करने का अधिकार नहीं है। भारत की ऊंची जातियों जैसे वर्ग को तो शासन करना ही नहीं चाहिए। अपनी आचार संहिता के नाम पर वे अति विशिष्ट वर्ग बन बैठे हैं। अपने पूर्वाग्रहों के दलदल में वे आकंठ