प्रांतीय विधायिका
45
डूबे हैं। जनसाधारण की इच्छाओं को उन्होंने कभी समझा ही नहीं। जनसाधारण से उन्हें कुछ लेना देना नहीं है। उनके हित भी अलग हैं। इसलिए इस मांग में कोई अनौचित्य नहीं है कि जो उम्मीदवार दूसरों का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, वह ऐसा होना चाहिए जिसके लक्ष्य, उद्देश्य और प्रयोजन वैसे ही हों जैसे उनके जिनका वह प्रतिनिधित्व करना चाहता है।
आरक्षित निवार्चन - क्षेत्र प्रणाली के बारे में तीसरी आपत्ति यह है कि इसके कारण अदक्षता आती है, क्योंकि रेखा से नीचे का उम्मीदवार रेखा से ऊपर के उम्मी दवार को लांघकर सीट हथिया लेता है। यह आलोचन भी सही है। परन्तु इस संबंध में भी अन्य विचारणीय बातें हैं, जिन्हें ध्यान में रखा ही जाए। सबसे पहले मैं प्रोफेसर डाइसे को उद्धत करूंगा। उन्होंने ठीक ही कहा है, ‘‘संवैधानिक व्यवस्था का बुनियादी उद्देश्य कभी भी नहीं रहा है कि बौद्धिक क्षमता वाली यथासंभव सर्वोत्तम संसद बने। दरअसल यह बात प्रतिनिधि सरकार के विचार के प्रतिकूल होगी कि ऐसी संसद के गठन का प्रयास किया जाए, जो बुद्धिमत्ता की दृष्टि से राष्ट्र के जनसाधारण से कहीं ज्यादा बेहतर हो।’’ लेकिन यह मान भी लिया जाए कि बौद्धिक वर्गों के स्थान पर अबौद्धिक वर्गों के उम्मीदवारों के आ जाने से नुकसान होगा, तो भी पिछड़ी जातियों के सहज आदर्शवाद से उस नुकसान की भरपाई जरूरत से ज्यादा हो जाएगी। इसमें संदेह नहीं कि उच्च वर्गों के प्रतिनिधि तुच्छ से तुच्छ चिंताओं से घिरे रहते हैं और बहुधा अपने वर्ग के धंधों में उलझे रहते हैं, राष्ट्र की उन्हें चिंता नहीं होती। उनका जीवन अति व्यस्त या धन लोलुपतापूर्ण इतना वैयक्तिक, इतना आत्म - केंद्रित और आत्म - तुष्ट होता है कि उनके लिए सामाजिक प्रगति की संकल्पना पानी के बुलबुले से अधिक नहीं होती, किन्तु निम्न वर्ग के लोगों को हर समय अपनी कठिनाइयों का अहसास रहता है, जिनका निराकरण केवल सामाजिक परिवर्तन से ही संभव है। जहां परस्पर निर्भरता की चेतना का जन्म सहकारिता की जरूरत से होता है और वह उदारता उत्पन्न करती है, वहां संस्कारविहीन शक्तियों तथा अविकसित गुणों वाली भावना उनकी इच्छाओं को भड़काती है। प्रगति संबंधी प्रेरक शक्ति के लिए हमें निम्न वर्ग का मुंह जोहना पड़ेगा। पिछड़ी हिन्दू जातियों के लिए सीटों का आरक्षण करके हम राष्ट्र सेवा के लिए अति सशक्त सामाजिक शक्तियां जुटा सकते हैं। उनके अभाव में कोई भी संसदीय सरकार विपन्न ही समझी जाएगी।
सांप्रदायिक निर्वाचक . मंडल : जिन संप्रदायों के हित के लिए सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों की व्यवस्था की गई है, उनके लिए एक भरोसे का प्रतिनिधित्व आवश्यक और अनिवार्य है। इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए। बहरहाल अगले कुछ समय तक जिस मुद्दे पर आपत्ति उठाई जा सकती है, वह है कि क्या यह सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों के जरिये ही हो? सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों के विरोधियों का आरोप है कि देश के विभिन्न भागों में काफी अर्से से जो सांप्रदायिक