3. प्रांतीय विधायिका - Page 63

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

दंगे होते रहे हैं, उनकी जिम्मेदारी सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों पर है। सीधे - सीधे तो यह पता नहीं चलता है कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों और सांप्रदायिक दंगों में क्या सीधा संबंध हो सकता है? इसके विपरीत दलील दी गई है कि मुसलमानों की मांग पूरी करने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडल बनाकर असंतोष और वैमनस्य का एक कारण दूर कर दिया गया है। किन्तु यह उतना ही सच है कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों के कारण सांप्रदायिक दंगे कम नहीं हो सके, बल्कि संभवतः कुछ बढ़े ही हैं, क्योंकि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडल सांप्रदायिक भावनाएं भड़काते ही हैं और वे ऐसी स्थिति पैदा करते ही हैं कि दोनों संप्रदायों के नेताओं के बीच एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि अपने संप्रदाय के लोगों को शांति की राह दिखाने के लिए बजाए वे भीड़ के क्षणिक आवेश में बह जाते हैं।

  1. मुसलमान इस व्यवस्था को कायम रखने पर जोर देते रहे हैं और वे अपने इस दृष्टिकोण के लिए तीन आधार बताते हैं।

  2. पहली बात वे यह कहते हैं कि मुस्लिम संप्रदाय के हित अन्य संप्रदायों के हित से भिन्न हैं और इन हितों की रक्षा के लिए उनके पास पृथक निर्वाचक - मंडलों की जरूरत है। इस सवाल के अलावा कि क्या अलग हितों की रक्षा के लिए अलग निर्वाचक - मंडल आवश्यक हैं, यह निश्चय करना भी आवश्यक है कि क्या कोई ऐसे हित हैं भी जिनके बारे में कहा जा सके कि वे इस अर्थ में भिन्न हैं कि वे किसी अन्य संप्रदाय के हित नहीं हैं। धर्मनिरपेक्षता धर्मसापेक्षता से भिन्न क्षेत्र है। धर्मनिरपेक्षता में हर मामले का सरोकार सभी से सामान्यतः होता है। यथा टैक्स दिया जाए या नहीं, देना है तो कितना और उसकी दर क्या हो? क्या राष्ट्रीय खर्च किसी एक मद की तुलना में दूसरी मद के लिए खासतौर पर निर्धारित किया जाए? क्या शिक्षा निःशुल्क और अनिवार्य हो? क्या सरकारी भूमि सीमित पट्टे पर दी जाए या दखलकारी पट्टे पर? क्या उद्योगों को सरकारी सहायता दी जाए? क्या किसी क्षेत्र विशेष में ज्यादा पुलिस तैनात की जाए? क्या सरकार श्रमिक वर्गों की गरीबी को देखते हुए उनके लिए सामाजिक बीमा की योजना तैयार करे, जिसके अधीन बीमारी, बेरोजगारी और मौत की दशा में सुविधा दी जाए, क्या अवैतनिक मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति से न्याय व्यवस्था का सर्वाधिक हित - साधन हुआ है? क्या और बेहतर नतीजों के लिए चिकित्सा आचार या विधि - आचार संहिता में सुधार की आवश्यकता है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो परिषद् के सामने विचारार्थ सामान्य रूप से आते हैं। इस प्रश्नावली में क्या कोई ऐसा प्रश्न है, जिसके बारे में यह कहा जा सके कि यह केवल मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित है? यह सही है कि मुस्लिम संप्रदाय शिक्षा और जनसेवा के प्रश्न के प्रति रुचि रखता है। परन्तु इस बारे में भी यह कहना ही पड़ेगा कि अकेला मुस्लिम संप्रदाय ही ऐसा नहीं है, जिसकी इन विषयों के प्रति विशेष रुचि है। गैर - ब्राह्मण और दलित वर्ग भी इस मसले में उतनी ही गहन रुचि रखते हैं। यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि