प्रांतीय विधायिका
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बंबई विधान परिषद् में प्रस्तुत विश्वविद्यालय सुधार विधेयक पर इन तीनों ने एकजुट होकर प्रयास किया। मुसलमानों के अलग हितों की बात करना कपोल कल्पना है। असल बात यह है कि अलग हित जैसी कोई चीज नहीं है, कतिपय मामलों के बारे में विशेष चिन्ता हो सकती है।
- चलो हम यह मान भी लें कि अलग हित हैं, पर सवाल यह है कि क्या सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों और आरक्षित सीटों की व्यवस्था के मुकाबले पृथक निर्वाचक - मंडलों की व्यवस्था से हन हितों की रक्षा बेहतर तरीके से हो सकती है? मेरा उत्तर यही है कि किसी अल्पसंख्यक संप्रदाय के पृथक या विशेष हितों की रक्षा पृथक निर्वाचक - मंडलों के मुकाबले सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों या आरक्षित सीटों की व्यवस्था द्वारा बेहतर तरीके से हो सकती है। यह स्वीकार करना होगा कि मुख्यतः कुछ अनुत्तरदायी अतिवादियों के कारण ही किसी हित पर आंच आती है। अतः हमारा उद्देश्य यह होना चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों को देश की परिषद्ों में आने ही न दें। यदि दोनों संप्रदायों के ऐसे अनुत्तरदायी व्यक्तियों को देश की परिषद्ों से परे रखना है, तो उसके लिए सर्वोत्तम प्रणाली यही है कि मुसलमान उम्मीदवार हिन्दुओं के मतों से निर्वाचित किए जायें और हिन्दू उम्मीदवार मुसलमानों के मतों से। सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों के बजाए संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्रों को तरजीह दी जानी चाहिए, क्योंकि पृथक निर्वाचक - मंडल प्रणाली के मुकाबले वे उस नतीजे को प्राप्त करने के लिए अधिक उपयुक्त हैं। जो भी हो, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अल्पसंख्यकों को पृथक निर्वाचक - मंडल प्रणाली की अपेक्षा संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्र प्रणाली से अधिक लाभ मिलता है। पृथक निर्वाचक - मंडल प्रणाली से अल्पसंख्यकों को केवल अपना निजी कोटा मिलता है। उससे अधिक कुछ नहीं। सदन के बाकी सदस्यों की उनके प्रति कोई निष्ठा नहीं होती। अतः वे अल्पसंख्यकों की इच्छापूर्ति की कामना से द्रवित नहीं होते। इस तरह अल्पसंख्यकों को केवल अपने साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रतिनिधित्व की कोई भी प्रणाली अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक नहीं बना सकती। अतः निश्चित है कि बहुमत उन पर हावी हो जाएगा। दूसरी ओर संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्रों तथा आरक्षित सीटों की व्यवस्था के अधीन अल्पसंख्यक न केवल अपने कोटे के स्थान पा सकेंगे, बल्कि उन्हें कुछ और भी लाभ मिल सकेगा। क्योंकि बहुसंख्यकों का हर सदस्य, जो आंशिक रूप से अल्पसंख्यकों के वोटों के बल पर जीतेगा, भले ही अल्पसंख्यकों का सदस्य न हो पर वह अल्पसंख्यकों का हितैषी सदस्य होगा। इस तरह मेरे विचार में यह एक बहुत बड़ा लाभ होगा। वह मिश्रित निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली को पृथक निर्वाचक - मंडल प्रणाली से बढि़या बनाता है। वह अल्पसंख्यकों का रक्षा - कवच हो सकता है। ऐसा लगता है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक यह सोचते हैं कि परिषद् कार्डिनलों की निर्वाचित सभा जैसी है, जिसे पोप के चुनाव के लिए बुलाया जाता है। वह तो धर्म - गुरुओं की सभा है जिसे धार्मिक विवादों के निपटारे के लिए बुलाया जाता है। यदि ऐसा होता, तो उनका यह