48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
आग्रह आचरण का विवेकपूर्ण मार्ग होता कि भले ही चन्द व्यक्ति हों, पर वे लौह पुरुष हों। परन्तु अब समय आ गया है, जब इस समुदाय को यह सोचना चाहिए कि यह सभा किसी धर्म - सभा से बहुत भिन्न है। यह एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है। वह धर्मनिरपेक्ष मामलों को तय करती है। ऐसे मामलों के निर्णय में फैसला सदा बहुसंख्यकों के पक्ष में होता है। यदि यह बात सही है, तो क्या ऐसी प्रणाली स्वयं अल्पसंख्यकों के हित में नहीं होगी, जो उसके सदस्यों के अलावा अन्य सदस्यों को भी उनके हितों का समर्थन करने के लिए मजबूर करती है।
- पृथक निर्वाचक - मंडलों के लिए, जो दूसरा मूल आधार बताया जा रहा है, वह है कि मुसलमान अपने आप में एक संप्रदाय हैं। वे अन्य संप्रदायों से भिन्न हैं, न केवल धार्मिक दृष्टि से अपितु अपने इतिहास, अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति, अपने पर्सनल कानूनों, अपनी सामाजिक रीति - रिवाजों की दृष्टि से भी। उनके कारण जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण इतना अधिक भिन्न हो गया है कि किन्हीं सांझे सामाजिक संबंधों, सहानुभूतियों अथवा सुविधाओं का उन पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ा है। वास्तव में उनकी एक पृथक जाति है। वे अपने बारे में ऐसा सोचते हैं, भले ही वे इस देश में सदियों से रहते चले आ रहे हैं। इसी धारणा के आधार पर यह दलील दी जाती है कि यदि उन्हें अन्य संप्रदायों के साथ संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्र में भाग लेने के लिए विवश किया जाता है, तो उसके फलस्वरूप जो राजनीतिक घुलन - मिलन होगा, उससे उनके संप्रदाय की विशिष्टता पर आंच आएगी। यह धारणा कहां तक सही तस्वीर पेश करती है, उस पर मैं विचार नहीं करना चाहता। इतना कहना काफी होगा कि मेरे विचार से यह ऐसी धारणा नहीं है, जिसके बारे में कहा जा सके कि वह जीवन के प्रति ईमानदार है। लेकिन यदि जान लिया जाए कि वह सही है और यह भी मान लिया जाए कि मुस्लिम संप्रदाय की खासियत को बनाए रखना एक ऐसा आदर्श है, जो इस संप्रदाय को स्वीकार्य है, तो भी हमारी समझ में नहीं आता कि इस प्रयोजन के लिए साम्प्रदायिक निवार्चक - मंडलां को क्यों आवश्यक समझा जाए? भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है जहां भिन्न - भिन्न जातियों के लोग रहते हैं और वहां सांझी सरकार बनाने की बात कही जाती है। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन ही कनाडा और दक्षिण अफ्रीका ऐसे दो देश हैं जहां दो अलग - अलग प्रजातियों के लोग सांझी शासन प्रणाली की
खोज कर रहे हैं। जैसे भारत में हिन्दू और मुसलमान हैं, वैसे ही दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश और डच हैं और कनाडा में अंग्रेज तथा फ्रांसीसी हैं। वे अलग - अलग जातियां हैं और उनकी अपनी-अपनी अलग - अलग संस्कृतियां हैं। परन्तु इनमें से किसी ने भी कभी संयुक्त निवार्चन - क्षेत्रों के बारे में इस आधार पर आपत्तियां नहीं उठाई कि चुनाव के लिए दो जातियों की सांझेदारी की सांझी व्यवस्था उनकी विशिष्टताओं को बनाए रखने के लिए हानिकर है। ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर भी ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है, जहां भिन्न - भिन्न जातियों के लोग संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्रों में भाग ले रहे हैं।