प्रांतीय विधायिका
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पोलैण्ड में पोल, रुथेनियाई, यहूदी, गोरे - रूसी, जर्मन और लिथुआनियाई हैं। लातविया में लातवियाई, रूसी, यहूदी जर्मन, पोल, लिथुआनियाई और एरुथोनियाई हैं। एस्थोनिया में जर्मन, यहूदी, स्वीड, रूसी, लातवियाई और तातारी हैं। चेकोस्लोवाकिया में चेक, चेकस्लोवाक, जर्मन, मय्यार, रुथेनियाई, यहूदी और पोल हैं। आस्ट्रिया में जर्मन, चेक और स्लौबेन हैं। जबकि हंगरी में, हंगेरियाई, जर्मन, स्लोवाक, रुथेनियाई, क्रोएशियन और सर्बियाई हैं। ये सभी समूह केवल संप्रदाय नहीं हैं। ये जातियां हैं। प्रत्येक की अपनी - अपनी अलग - अलग विशिष्टता है। वे एक ही सरकार के अधीन मिलजुल कर रहती हैं, फिर भी उनमें से किसी ने भी संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों के बारे में इस आधार पर आपत्ति नहीं की कि उनमें भाग लेने से उनकी विशिष्टता लुप्त हो जाएगी।
पर इस तर्क की व्यर्थता सिद्ध करने के लिए गैर - मुस्लिम संप्रदायों का उदाहरण देना आवश्यक नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां विश्व के अन्य भागों में मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने कभी भी अपनी विशिष्टता बनाए रखने के लिए सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों की जरूरत महसूस नहीं की। इसके बारे में नहीं कहा जा सकता कि वह तो अन्य संप्रदायों के साथ राजनीतिक संसर्ग से लगने वाली छूत की बीमारी है। ऐसा लगता है कि इस बात का पर्याप्त ज्ञान नहीं है कि भारत ही एक ऐसा देश नहीं है, जहां मुसलमान अल्पसंख्या में हैं। ऐसे अन्य देश भी हैं जहां उनकी ऐसी ही स्थिति है। अल्बानिया में मुसलमानों की तादाद काफी ज्यादा है। बल्गारिया, यूनान और रुमानिया में वे अल्पसंख्यक हैं और यूगोस्लाविया तथा रूस में वे अति अल्प संख्या में हैं। क्या वहां मुस्लिम संप्रदायों ने सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों की जरूरत पर बल दिया है? राजनीतिक इतिहास के सभी अध्येता यह जानते हैं कि इन देशों के मुसलमानों ने पृथक् निवार्चक - मंडलों के बिना काम चलाया है। ना ही उन्हें प्रतिनिधित्व के किसी निश्चित अनुपात का आश्वासन दिया गया है। फिर भी भारत में ऐसा मतैक्य है कि भारत में अभी राजनीति में सम्पूर्ण धर्मनिरपेक्षता की स्थिति नहीं आ पाई है। अतः यहां मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व की गारंटी मिलनी चाहिए, वरना कहीं ऐसा न हो कि बहुमत के विद्वेश के कारण राजनीतिक फलक से उनका नामोनिशान ही मिट जाए। दुनिया के अन्य भागों के मुस्लिम अल्पसंख्यक अपना काम इस आश्वस्त कोटे के बिना ही चला रहे हैं। इसलिए मेरे विचार में भारत में मुसलमानों द्वारा प्रस्तुत तर्क अपने लक्ष्य से काफी भटक गया है और मेरे विचार में उसका कोई औचित्य नहीं है।
मुसलमानों के लिए पृथक सांप्रदायिक निवार्चक - मंडलां को बनाये रखने के पक्ष में तीसरा तर्क यह दिया जाता है कि इस बात का अंदेशा है कि मिले - जुले निर्वाचन - क्षेत्र में मुसलमानों की वोट - शक्ति को गैर - मुस्लिम वोट शक्ति इतनी क्षीण कर देगी कि मिले - जुले निर्वाचन-क्षेत्र से चुना गया ऐसा मुस्लिम प्रतिनिधि मुसलमानां का सच्चा प्रतिनिधि न होकर कमजोर प्रतिनिधि होगा और गैर - मुस्लिम संप्रदायों के हाथों की कठपुतली होगा। यह आशंका सही दीख पड़ती है, इसमें संदेह नहीं। परन्तु थोड़े बहुत