3. प्रांतीय विधायिका - Page 67

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

विवेक से यह समझा जा सकता है कि यह निराधार है। यदि बहुसंख्य गैर - मुस्लिम मतदाता किसी मुसलमान उम्मीदवार को चुनते हैं, तो जो परिणाम मुसलमान सोचते हैं, वह सही हो सकता है यदि गैर - मुस्लिम ऐसी कोई शरारत करने पर तुल जाए। परन्तु वास्तविकता यह है कि आम चुनाव के समय बहुत से गैर - मुस्लिम उम्मीदवार होंगे। ऐसी स्थिति में सभी गैर - मुस्लिम मतदाताओं की पूरी शक्ति मुसलमान उम्मीदवारों पर केन्द्रित नहीं होगी। ना ही गैर-मुस्लिम उम्मीदवार की पूरी शक्ति मुसलमान उम्मीदवारों पर केन्द्रित करके गैर - मुस्लिम मतदाताओं को अपने वोट बर्बाद करने देंगे। इसके विपरीत वे यदि सभी को नहीं, तो अनेक मतदाताओं को अपने लिए जुटा लेंगे। यदि यह विश्लेषण सही है तो इसका अर्थ होगा कि बहुत कम गैर - मुस्लिम मतदाता मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने के लिए बचे रहेंगे। इस तरह मुसलमानों की यह आशंका कि गैर - मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर कोई कार्यवाही मुस्लिम उम्मीदवारों के विरुद्ध करेंगे, नितांत निर्मूल धारणा है। स्वयं मुसलमान भी इस बात पर यकीन नहीं करते जैसा कि ‘दिल्ली’ प्रस्तावों से प्रकट होता है। इन प्रस्तावों के अनुसार जिनका जिक्र इस प्रतिवेदन में किया जा चुका है, मुसलमानों ने इस बारे में सहमति प्रकट की है कि वे सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों को छोड़ देंगे और संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्रों को अपना लेंगे बशर्ते कि सांप्रदायिक प्रांतों की उनकी मांग पूरी कर दी जाए और पंजाब तथा बंगाल में उन्हें मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व के बारे में कतिपय अन्य रियायतें दे दी जाएं। अब यदि मान लिया जाए कि इन सांप्रदायिक प्रांतों का अपने से बाहर कोई मतलब नहीं है और हमें यही धारणा बनानी होगी, तो यह स्पष्ट है कि किसी भी प्रांत में मुसलमान अल्पसंख्यक इस प्रकार के संरक्षण से संतुष्ट होंगे, जिसे वे संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्रों से प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए सवाल यह है कि सांप्रदायिक प्रांतों को जोउ़े बिना संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र पर्याप्त क्यों नहीं होने चाहिए, जब उनके बारे में कहा जाता है कि सांप्रदायिक प्रांतों को जोड़ने से वे पर्याप्त होंगे। चलिए इस बात को छोड़ भी दें, तो यदि इस मुस्लिम दृष्टिकोण में कोई सार है कि वोटों का काटा जाना ऐसी बुराई है, जो संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्र प्रणाली से स्वयं चिमड़ जाती है, तो मेरे विचार में उसका इलाज सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों को बनाए रखना नहीं है। उसका इलाज है कि वयस्क मताधिकार को लागू करके मुस्लिम निर्वाचकों की संख्या को यथासंभव पूर्णतम क्षमता तक बढ़ाया जाए। इसका प्रभाव यह होगा कि मुस्लिम संप्रदाय की मतदाता संख्या पर्याप्त रूप से बढ़ जाएगी। उससे गैर - मुस्लिम वोटों के मिश्रण से संभावित तरलीकरण का दुष्प्रभाव नहीं हो पाएगा।

  1. इन सब तथ्यों से पता चलता है कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों का समर्थन किसी भी युक्तिसंगत आधार पर सही नहीं उतरता। इसका आधार केवल भावुकता और भावना है। मैं यह नहीं कहता कि राजनीतिक समस्याओं के समाधान में भावना और भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं है। मैं यह भलीभांति समझता हूँ कि सरकार