प्रांतीय विधायिका
51
के प्रति आस्था विश्वास पर टिकी होती है और विश्वास का मूल है - भावना। ऐसी आस्था को प्राप्त किया जाए, यदि उसे राज्य व्यवस्था को हानि पहुंचाए बिना प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व बुनियादी तौर पर इतना गलत है कि उसके मामले में भावना के वशीभूत हो जाना बुराई को अमर करना होगा। उसके विरोधी भी इस प्रणाली के मूल दोष को नहीं देख पाये हैं। लेकिन इसमें मूल दोष है, यह उस हर व्यक्ति के सामने प्रत्यक्ष हो जाएगा, जो उसके कार्यान्वयन की ओर ध्यान देगा। यह स्पष्ट है कि मुस्लिम प्रतिनिधि गैर - मुस्लिमों के लिए कानून बनाते हैं। वे गैर - मुस्लिमों से एकत्रित राजस्व का निपटारा करते हैं। वे गैर - मुस्लिमों के लिए शिक्षा - नीति का निर्धारण करते हैं। वे यह तय करते हैं कि गैर - मुस्लिम कौन - कौन सा कितना कर प्रदान करें। ये वे कुछ अति महत्वपूर्ण फैसले हैं, जो मुसलमान विधायक करते हैं और उनके द्वारा गैर - मुस्लिमों के हित को प्रभावित करते हैं। एक सवाल उठाया जा सकता है कि किस अधिकार से वे ऐसा करते हैं? ध्यान रहे कि इसका जवाब यह नहीं है कि गैर - मुस्लिमों के प्रतिनिधि चुने जाने के अधिकार से वे ऐसा करते हैं। उत्तर है कि मुस्लिमों के प्रतिनिधि चुने जाने के अधिकार से। राजनीतिक जीवन का यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि ‘शासन’ शासित वर्ग की सहमति से ही होना चाहिए। ऊपर मैंने किस आधार पर कहा है कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडल उस सिद्धान्त का उल्लंघन करते हैं? आधार यह है कि यह सहमति के बिना शासन है। यह रा जनीतिक न्याय के समूचे विवेक के प्रतिकूल है कि ऐसी प्रणाली का अनुमोदन किया जाए, जो एक समुदाय के लोगों को यह अनुमति देती है कि वे स्वयं को दूसरे समुदायों के मताधिकार के आगे समर्पित किए बिना उन पर शासन करे। यदि जैसा कि मुसलमान कहते हैं कि उनकी एक विशिष्ट जाति है और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण में अन्य जातियों के दृष्टिकोण से भारी अन्तर हैं, तो प्रणाली में निहित खतरा इतना भयानक हो जाता है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
- परिषद् के वर्तमान गठन में यही खामियां हैं। इसका गठन 1919 में साउथबरो कमेटी ने किया था। कमेटी द्वारा तैयार किए गए ढांचे के स्वरूप को भारत सरकार ने दिनांक 23 अप्रैल, 1919 के अपने 1919 के डिस्पैच संख्या 4 में स्पष्ट कर दिया था। डिस्पैच भारत - मंत्री के नाम था। उसमें कहा गया था :
‘‘इसमें पहले कि हम (साउथबरो कमेटी) की रिपोर्ट का ब्यौरेवार विचार करें, कुछ
महत्व का एक प्रारंभिक प्रश्न सामने आ जाता है। जैसा कि आप देखेंगे कि कमेटी
के कार्य को बहुत अधिक सीमा तक सिद्धान्तों के प्रतिपादन की दिशा में नहीं
मोड़ा गया है। उनके सामने जो विभिन्न समस्याएं आईं, उन पर विचार करते समय
उन्होंने अपने समाधान को सामान्य तर्कों पर आधारित करने के बजाए आमतौर
से किसी समझौते पर पहुंचने की कोशिश की।’’