52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मेरे साथियों ने मौजूदा ढांचे के मूल महत्व पर विचार करने का कष्ट नहीं उठाया है। इस बात में तो कोई शक नहीं कि उन्होंने यह सिफारिश की है कि मनोनयन की प्रणाली समाप्त कर दी जाए। मैं उनकी इस बात से सहमत हूँ। लेकिन उसके अलावा उन्होंने निर्वाचन के समूचे ढांचे को ज्यों का त्यों रखा है, जैसे कि उस पर कोई एतराज ही न हो। इस बारे में मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। मैं कह चुका हूँ कि यह समूचा ढांचा ही दोषपूर्ण है और इसमें आमूल परिवर्तन किया ही जाना चाहिए। मैं यह कहना चाहूंगा कि सुधारों का लक्ष्य अगस्त 1917 की घोषणा में बताया गया है। उसमें स्वशासी संस्थाओं की स्थापना के लक्ष्य की घोषणा की गई है। उस समय निर्वाचन का जो ढांचा खड़ा किया गया था, वह इसकी प्राप्ति की दिशा में केवल अधूरा ढांचा था। उसका औचित्य केवल इसलिए था कि उसमें स्वीकार किया गया था कि नौकरशाही के राज से लोक राज तक का संक्रमण काल जरूरी था। निर्वाचन के वर्तमान ढांचे को केवल इस अनुमान पर जारी रखा जा सकता है कि विभक्त शासन की वर्तमान प्रणाली चलती रहेगी। प्रतिनिधित्व की वर्तमान प्रणाली पूर्ण शासन से तनिक भी मेल नहीं खाएगी। अतः उसे तो ठुकरा ही दिया जाए।
मौजूदा प्रतिनिधित्व प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने का एक और भी कारण है। सर्वत्र प्रतिनिधि सरकार का मतलब है पार्टी की सरकार। वास्तव में तो पार्टी की सरकार प्रतिनिधि सरकार का ऐसा अनिवार्य पुछल्ला है कि बखूबी कहा जा सकता है कि प्रतिनिधि सरकार केवल पार्टी सरकार के माध्यम से ही चल सकती है। सर्वोत्तम प्रकार की पार्टी सरकार वह होती है, जो द्विदलीय प्रणाली के अधीन चले और स्थिर तथा उत्तरदायी सरकार सुनिश्चित कर सके। कार्यपालिका को उस हद तक उत्तरदायी बनाया जाए, जितना कानून द्वारा उसे विधायिका के प्रति जिम्मेदार बनाया जा सकता है। परन्तु यदि विधायिका का गठन इस प्रकार किया गया हो कि वह कार्यपालिका पर अपनी इच्छापूर्ति के लिए प्रभाव न डाल सके, तो यह दायित्व नाममात्र का होगा। स्थिर सरकार के लिए आवश्यक है कि कोई अनिश्चितता न रहे। कार्यपालिका के लिए अति आवश्यक है कि वह अपनी कार्यप्रणाली को इस प्रकार निर्धारित करे कि वह सदा किसी व्यवस्थित योजना नीति का पालन करे। लेकिन इसके लिए बहुमत का अडिग समर्थन चाहिए। ऐसा केवल तभी हो सकता है, जब द्विदलीय प्रणाली हो। यह समूह - प्रणाली में संभव नहीं है। समूह - प्रणाली के अधीन कार्यपालिका मतैक्य वाली बृहद सभा नहीं होगी, बल्कि उन समूहों के नेताओं के सिद्धान्तों की पैबन्द लगी गुदड़ी होगी जो सत्ता के फेर में अपनी निष्ठा दांव पर लगाने के लिए राजी हो गये हैं। ऐसी प्रणाली कदापि स्थिर सरकार के लिए जरूरी सतत समर्थन का आश्वासन नहीं दे सकती। इसका कारण यह है कि वहां निजी लाभ के लिए सदा ही समूहों के हेरफेर का लोभ बना रहता है। वर्तमान परिषद्, प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण बर्क के शब्दों में, ‘‘यह भानमती का पिटारा है जो आडी - टेढ़ी व उल्टी - पल्टी बढ़ईगिरी का नमूना है, बेतुकी पच्चीकारी की खिचड़ी है, बिना सीमेंट का फूलपत्तिदार फर्श है और