3. प्रांतीय विधायिका - Page 70

प्रांतीय विधायिका

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है सरकार के मित्रों और खुले शत्रुओं का बेतुका जमावड़ा’’। छुईमुई और रेत के महल जैसी यह विधायिका द्विदलीय शासन प्रणाली को शायद ही स्वीकार कर सके। पार्टी प्रणाली के बिना न तो स्थिर और न ही उत्तरदायी सरकार होगी। निर्वाचन - क्षेत्रों का गठन करते समय समूह - प्रणाली के मूल की छानबीन करनी ही होगी। इसका कारण है, बहरहाल निर्वाचन - क्षेत्र वे सांचे हैं जिनमें परिषद् को ढाला जाता है। यदि परिषद् का पुनर्गठन इस प्रकार करना है कि वह दक्षता से काम कर सके, तो जाहिर है कि सांचे का पुनर्निर्माण करना ही पड़ेगा।

  1. निर्वाचन प्रणाली को नया रूप देने के सुझाव देते समय मैंने तीन बातों का ध्यान रखा है : (1) भारत के बहुत से राजनेताओं के इस घातक भोलेपन से गुमराह न हों कि निर्वाचन प्रणाली केवल क्षेत्रीयता पर आधारित हो और देश की सामाजिक परिस्थितियों से उसका कोई रिश्ता नाता न हो; (2) विशेष प्रतिनिधित्व के लिए किसी ऐसे आर्थिक या सामाजिक हित को मान्यता न दी जाए, जो क्षेत्रीय निर्वाचन - क्षेत्रों के जरिए प्रतिनिधित्व पा सकता हो; और (3) यदि किसी हित को विशेष प्रतिनिधित्व का पात्र समझा जाता है, तो प्रतिनिधित्व का तरीका ऐसा हो कि ऐसे हित के प्रतिनिधित्व को अलग समूह बनाने की छूट न हो।

  2. इन तीन बातों में से दूसरी प्रत्यक्षतः मताधिकार पर आधारित है। रिपोर्ट के एक और भाग में मैंने वयस्क मताधिकार को लागू करने की सिफारिश की है। मुझे यकीन है कि इसे स्वीकार कर लिया जाएगा। मैंने अपनी सिफारिशों का आधार इसी को बनाया है। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है और यदि सीमित मताधिकार प्रथा जारी रहती है, तो उस स्थिति में भिन्न सिफारिशें करनी होंगी। इनका भी मैंने प्रस्ताव किया है। उपरोक्त कारणों से और अंतिम उल्लेख के अनुसार मेरा सुझाव है कि :

(1) यदि वयस्क मताधिकार स्वीकार कर लिया जाता है, तो मुसलमानों, दलितों

और आंग्ल - भारतियों के अतिरिक्त अन्य वर्गों को क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व दिया

ही जाएगा।

(2) यदि मताधिकार सीमित रखा जाता है, तो मुसलमानों, दलितों और आंग्ल -

भारतीयों, मराठों और सम्बद्ध जातियों तथा श्रमिकों को छोड़कर बाकी के

लिए मतदान क्षेत्रीय ही होगा।

(3) ऐसा विशेष प्रतिनिधित्व सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों और आरक्षित सीटों के जरिये दिया जाएगा। श्रमिकों को यह रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियनों से बने निर्वाचन-क्षेत्र के जरिये दिया जाएगा।

  1. इन सुझावों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि मैं इसके पक्ष में हूँ कि समूची वर्गीय निर्वाचक - मंडल प्रणाली को समाप्त कर दिया जाए, यथा (1) इनामदारों और सरदारों, (2) व्यापार तथा वाणिज्य, चाहे भारतीय हो या यूरोपीय, (3) भारत के ईसाइयों, और (4) उद्योग के लिए। इसे सामान्य निर्वाचन - क्षेत्रों के साथ मिला दिया जाए। ऐसी कोई