54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
बाधा नहीं है, जो साधारण मार्ग से परिषद्ों में उनकी आवाज को सुने जाने से रोक सके। दूसरी बात यह है कि हालांकि मैं कुछ वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का समर्थन करता हूँ, परन्तु मैं पृथक निर्वाचन - क्षेत्रों के जरिए उन्हें प्रतिनिधित्व दिए जाने के विरुद्ध हूँ। क्षेत्रीय निर्वाचन - क्षेत्र और पृथक निर्वाचक - मंडल दो चरम सीमाएं हैं, जिनसे बचना ही होगा। इस अति अलोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र शासन प्रणाली लागू करने के लिए प्रतिनिधित्व की जो योजना बनाई जाए, उसमें उक्त निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए कोई स्थान होना ही नहीं चाहिए। आदर्श मार्ग है आरक्षित सीटों वाला संयुक्त निवार्चन - क्षेत्र। इससे कम पर्याप्त नहीं होगा और इससे अधिक सुप्रशासन के लक्ष्यों को ही विफल कर देगा। यूरोपीय समुदाय के मामले को मैं प्रत्यक्ष कारणों से अपवाद मानता हूँ। उनके लिए विशेष निर्वाचन - क्षेत्रों की व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन वे निश्चय ही सामान्य निर्वाचन - क्षेत्र होंगे, वर्गीय निर्वाचक - मंडल नहीं।
अध्याय 3
सीटों का बंटवारा
1. अल्पसंख्यकों में सीटों का बांटवारा
- मेरे साथियों ने विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए सीटों का जो कोटा निश्चित किया है, उसकी सारणी इस प्रकार है :
अलपसंख्यक सीटों की संख्या 140 में से
सामान्य और विशेष
1 यूरोपीय 2 5
2 आंग्ल - भारतीय 2 शून्य
3 भारतीय ईसाई 11 शून्य
4 दलित वर्ग 10 शून्य
5 मुस्लिम 43 2
- इस सारणी से प्रकट होता है कि मेरे साथियों ने विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए सीटों का बंटवारा करते समय एक समान सिद्धान्त नहीं अपनाया है। ना ही ऐसा लगता है कि उन्होंने सम्बद्ध अल्पसंख्यकों के साथ कोई न्याय करने का प्रयास किया है। यह बात स्पष्ट हो जाती है, जब मेरे साथियों द्वारा मुसलमानों के साथ किए गए बर्ताव की तुलना हम दलित वर्गों के साथ किए गए बर्ताव से करते हैं। प्रेसिडेंसी में मुसलमानों की संख्या विधान परिषद् के लिए नियत कुल प्रतिनिधित्व में से 19 प्रतिशत