3. प्रांतीय विधायिका - Page 72

प्रांतीय विधायिका

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है। मेरे साथियों ने उनके लिए 31 प्रतिशत से भी ज्यादा दिए जाने का प्रस्ताव किया है। दूसरी ओर अति अनुदार आकलन के अनुसार भी दलितों की संख्या प्रेसिडेंसी के कुल आबादी का 8 प्रतिशत है और उनके लिए परिषद् की कुल सीटों का केवल 7 प्रतिशत भाग दिया गया है। इस भेदभाव का कोई कारण नजर नहीं आता। दोनों अल्पसंख्यकों में से मुसलमान अल्पसंख्यकों की संख्या निस्संदेह अधिक है। वे सम्पन्नता और शिक्षा की दृष्टि से भी काफी आगे हैं। दलित वर्ग संख्या, संपन्नता और शिक्षा में तो पिछड़े हैं ही, उस पर ऐसी असमर्थताओं का भी भार है जिससे मुसलमान नितांत बरी हैं। दलित वर्ग के लोग सार्वजनिक पनघटरों से पानी नहीं ले सकते भले ही उनका रखरखाव सरकारी खर्च से होता हो। मुसलमान पानी ले सकते हैं। अछूत होने के कारण दलित जाति के लोग पुलिस, थल सेना और नौ सेना में भरती नहीं हो सकते हालांकि भारत सरकार के अधिनियम का प्रावधान है कि जाति, नस्ल या रंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं रखा जा सकता। मुसलमानों के लिए न केवल सरकारी सेवाओं के द्वार खुले हैं, बल्कि कुछ विभागों में तो उनकी संख्या सर्वाधिक है। दलित वर्गों के बच्चों को सार्वजनिक स्कूलों में दाखिला नहीं मिल सकता, हालांकि उन पर सार्वजनिक कोष से पैसा खर्च होता है। मुसलमानों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। दलित वर्ग के व्यक्ति का स्पर्श भ्रष्ट कर देता है, मुसलमानों का नहीं। व्यापार और उद्योगों में मुसलमानों पर कोई पाबंदी नहीं जबकि दलितों पर है। मुसलमानों पर हीनता का कलंक भी नहीं लगा हुआ है, जैसा कि दलितों पर लगा है। परिणामस्वरूप मुसलमान इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि जैसे चाहें पहनावा पहनें, जैसे चाहें रहें और जैसे चाहें करें। दलितों को यह छूट नहीं है। कोई दलित आर्थिक सामर्थ्य होने के बावजूद अपना पैसा खर्च करके गांव वालों से अच्छा वस्त्र नहीं पहन सकता। उन्हें झोंपड़ी में ही रहना पड़ेगा। कोई दलित उत्सव आदि पर भी अपने धन और ऐश्वर्य का अधिक प्रदर्शन नहीं कर सकता। उसका दूल्हा बारात में सड़कों पर घुड़चढ़ी नहीं कर सकता। जो रीति - रिवाज उसके लिए बनाए गए हैं, उन्हें तोड़ने पर उसे समूचे गांव वालों के कोप का भाजन बनना होगा, जिनके बीच वह रहता है। दलित जातियों को बहुधा बहुसंख्यकों का अत्याचार झेलना पड़ता है। मुसलमानों को उतना नहीं झेलना पड़ता। इसका कारण है कि मुसलमानों को बुनियादी मानव अधिकार प्राप्त हैं, इसलिए उनका बहुसंख्यकों से झगड़ा नहीं होता सिवाय उसके जब कोई धार्मिक विवाद उठ खड़ा हो। परन्तु दलितों की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। उन्हें अपने मानवीय अधिकारों के लिए सतत संघर्ष करना पड़ता है, जो अल्पसंख्यकों के लिए सतत चुनौती है। वे उनको ये अधिकार देना नहीं चाहते। इसका नतीजा यह है कि उन्हें बराबर बहुसंख्यकों का विरोध सहना पड़ता है। इतना ही नहीं है, अगर मुसलमानों पर बहुसंख्यकों का कोई जुल्म होता है, तो पुलिस और मजिस्ट्रेट के लंबे