3. प्रांतीय विधायिका - Page 73

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हाथ उसकी सहायता करते हैं, परन्तु जब किसी दलित पर बहुसंख्यकों का अत्याचार होता है, तो पुलिस और मजिस्ट्रेट कभी - कभार ही उसकी रक्षा करते हैं। दलित के खिलाफ उनकी बहुसंख्यकों से मिलीभगत होती है। उसकी सीधी सी वजह है कि प्रांत की पुलिस और मजिस्ट्रेट के कार्यालय में मुसलमान अपने अनेक परिचितों तथा संबंधियों तक पहुंच सकते हैं, जबकि दलितों का कोई सगा - संबंधी उन विभागों में नहीं होता और यह भी ध्यान रखने की बात है कि दलितों को केवल रूढि़वादी हिन्दुओं की मार को ही झेलना नहीं पड़ता। उसे मुसलमानों को भी भुगतना पड़ता है, आमतौर पर समझा जाता है, कि मुसलमान उन सामाजिक पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं, जो दलितों के प्रति हिन्दू रखते हैं। इससे बड़ी भूल और कोई हो नहीं सकती। शहरी क्षेत्रों की बात छोड़ दें, गांवों में भी तो मुसलमानों का रवैया हिन्दुओं जैसा विषैला ही है। कोलाबा जिले के मानगांव तालुक के हरकुल ग्राम में जो दंगे हुए, वे इस बात के प्रमाण हैं। इस जिले में दलितों ने समाजोत्थान का एक अभियान चलाया और उन गंदे रिवाजों का परित्याग करने का संकल्प लिया, जो उन पर घटिया दर्जे का इंसान होने का ठप्पा लगाते हैं। इस जिले के जिन हिन्दुओं ने उन्हें उपदेश दिया था कि वे गंदे कामों को त्याग दें, तभी उनका उद्धार संभव है, उन्हीं का अत्याचार इन गरीबों को झेलना पड़ा और उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया गया। इस बात की कभी उम्मीद ही नहीं थी कि जिले के मुसलमानों का व्यवहार भी अपने पड़ोसी हिन्दुओं जैसा ही होगा। इसके विपरीत दलितों को आशा थी कि स्पृश्य हिन्दुओं के खिलाफ संघर्ष में मुसलमान उनका साथ देंगे, परन्तु उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्योंकि शीघ्र यह पता चल गया कि छुआछूत न मानने पर भी मुसलमान हिन्दुओं की भांति इस गंदी धारणा से जकड़े हुए थे कि उनका जन्म ही घटिया सामाजिक स्तर के लिए हुआ है, और अपनी गंदी आदतों को छोड़कर वे अपने उद्धार के जो प्रयत्न कर रहे हैं, वह उनका अपमान और निरादर है और उसे कुचल दिया जाए। इसके फलस्वरूप दलितों और मुसलमानों के बीच जिले में कई झगड़े हुए। उनमें से एक में हरकुल में एक दलित को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

  1. इसलिए यह स्पष्ट है कि दलितों की समस्या मुसलमानों की समस्या से ज्यादा विकट है। भले ही जाति के रूप में मुसलमान पिछड़े हो सकते हैं, पर कम से कम वे शिक्षा के क्षेत्र में इतने उन्नत हुए हैं कि केवल उन्नत हिन्दुओं से ही पीछे हैं। परन्तु निश्चित रूप से वे बाधाग्रस्त नहीं हैं। अतः प्रोत्साहन और प्रयास से वे आगे बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर दलित जातियां न सिर्फ पिछड़ी हैं, बल्कि बाधाग्रस्त भी हैं। इसलिए कोई प्रयास या प्रोत्साहन तब तक उनके उत्थान में सहायक नहीं हो सकता, जब तक कि सबसे पहले उनकी बाधा दूर न की जाए। दोनों के बीच यह फर्क है। मुसलमानों की पिछड़ी स्थिति सुधारने के लिए जितनी राजनीतिक शक्ति जरूरी है,