प्रांतीय विधायिका
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दलितों का पिछड़ापन दूर करने के लिए उससे दुगुनी की आवश्यकता है, भले ही उससे अधिक की न हो। इसके बावजूद मेरे साथियों ने उनके प्रतिनिधित्व का अनुपात उलट दिया है। मुसलमान आबादी का 19 प्रतिशत है और उनका एक मजबूत अल्पसंख्यक वर्ग है। उन्हें परिषद् में 31 प्रतिशत स्थान दिए गए हैं, जबकि अति अनुदार अनुमान के अनुसार दलितों की संख्या आबादी का 8 प्रतिशत है और उनके लिए परिषद् में केवल 7 स्थान नियत किए गए हैं। वह वास्तव में उनकी आबादी के अनुपात से एक प्रतिशत कम है।
यह कहा जाता है कि दलितों की समस्या सामाजिक समस्या है, इसलिए इसका समाधान सामाजिक मंच पर खोजा जाये। मुझे आश्चर्य है कि उच्च क्षेत्रों का भी ऐसा ही दृष्टिकोण है। मेरा यह विचार है कि यह दृष्टिकोण अपनाने वाले यह भूल जाते हैं कि मानव समाज में प्रत्येक समस्या एक सामाजिक समस्या है। पीने की समस्या, मजदूरी की समस्या, काम के घंटे, आवास, बेरोजगारी, बीमा, ये सभी सामाजिक समस्याएं हैं। इसी तरह छुआछूत भी सामाजिक समस्या है। पर सवाल यह नहीं है कि यह समस्या सामाजिक समस्या है या नहीं। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक शक्ति से वह हल की जा सकती है। मेरा जोरदार जवाब है कि निश्चय ही हल हो सकती है। यही कहना ठीक है कि भारत की सरकार, भले ही स्पृश्य और अस्पृश्य चाहें या न चाहें, उन्हें एक ही परिवार के लोगों की तरह रहने के लिए विवश नहीं कर सकेगी। ना ही सरकार विधायिका के अधिनियम या विधायिका की परिषद् के आदेश द्वारा उनमें प्यार - मोहब्बत करवा सकती है या उन्हें गले से लगवा सकती है। लेकिन सरकार उन सभी बाधाओं को दूर कर सकती है, जो अस्पृश्यों को उनकी दयनीय दशा में रहने के लिए विवश करती हैं। यदि यह दृष्टिकोण सही है, तो किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत दलित वर्गों को है।
मेरे साथियों ने कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया है कि किस कारण मुसलमानों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से 12 प्रतिशत अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। किस कारण दलितों को उतना ही प्रतिनिधित्व न दिया जाए, जो जनसंख्या के आधार पर उनके हिस्से में आता है। यह उल्लेखनीय बात है कि मुसलमानों के गवाहों ने जो दलील दी थी कि उन्हें बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व दिया जाए, जैसा कि आशा की जाती थी, वह इस आधार पर नहीं मांगा गया था कि उनकी प्रगति अथवा उनके कल्याण के लिए वह आवश्यक था। उनकी एकमात्र दलील यह थी कि वे शासक वर्ग के वंशज हैं और उन्हें बढ़े हुए प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इसके बिना उनका महत्व और प्रभाव घट जाएगा। इससे यह प्रकट होता है कि मुसलमान यह व्यवस्था अपनी पर्याप्तता के आधार पर नहीं, अपितु अपनी श्रेष्ठता के आधार पर मांगते हैं। मेरा दृढ़ विचार है कि किसी भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में