3. प्रांतीय विधायिका - Page 75

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सभी समुदायों को समान राजनीतिक महत्व देना ही पड़ेगा। और इस बात की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाए कि कोई समुदाय अपने को अफलातून घोषित करे। जब कोई यह कहता है कि उसका समुदाय महत्वपूर्ण है और उसे पर्याप्त तथा न्यायोचित प्रतिनिधित्व दिया जाए, तो उस दावे पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जा सकता है। परन्तु जब कोई कहे कि उसका समुदाय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है और उसे समुचित अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, तो निस्संदेह उसका अनिवार्य अर्थ होगा कि अन्य समुदाय अपेक्षतः घटिया है और उन्हें उनके हिस्से से कम मिलना चाहिए। स्वाभाविक है कि इस स्थिति को दूसरे समुदाय स्वीकार नहीं कर सकते। जितनी जल्दी मुसलमान इस बेतुकी धारणा को त्याग देंगे, उनके भविष्य के लिए यह उतना ही बेहतर होगा। इस तरह उस लाभ से कोई लाभ नहीं, जिसके लिए दूसरे समुदाय सहमत न हों और सदा - सर्वदा संघर्ष करना पड़े। उल्टे इससे मुसलमानों को ही नुकसान होगा, क्योंकि इससे संभवतः उनके और दूसरों समुदायों के बीच पृथकता और घृणा का बीजारोपण होगा।

  1. केवल मुसलमान ही ऐसा वर्ग नहीं है, जो कभी शासक रहा हो और उनकी स्थिति में ह्रास आया। कनाडा में फ्रांसीसियों और दक्षिण अफ्रीका में डचों की भी ऐसी दूसरी मिसालें हैं, जहां एक शासक - वर्ग शासित - वर्ग बन गया है। परन्तु न तो फ्रांसीसियों ने कनाडा में और न ही डचों ने दक्षिण अफ्रीका में अनापशनाप प्रतिनिधित्व की मांग की है। ताकि वे शासकों की अपनी पूर्व स्थिति को बनाए रख सकें। ना ही दुनिया के अन्य देशों के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को ऐसी रियायत दी गई है। अल्बानिया, रूमानिया, यूनान और बल्गारिया के मुस्लिम अल्पसंख्यक भी कभी शासक रहे थे। फिर भी उन देशों में से किसी भी देश में उन्होंने ऐसे असाधारण प्रतिनिधित्व की मांग नहीं उठाई है। मुसलमानों का प्रभावानुसार प्रतिनिधित्व का दावा न तो कभी सुना गया और न ही वह किसी प्रतिनिधि सरकार के अनुकूल है। प्रत्येक समाज में जमींदारों, पूंजीपतियों और पुरोहितों का बहुत प्रभाव है परन्तु इस बात को कभी भी किसी ने स्वीकार नहीं किया है कि इन वर्गों को अत्यधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसलिए इसमें कोई तुक नहीं है कि मुसलमानों का दावा स्वीकार कर लिया जाए, जबकि इसी प्रकार के दावे को अन्यत्र रद्द कर दिया गया है।

  2. भारत में ब्रिटिश शासन के पूर्व उनकी कुछ स्थिति रही हो, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि भारत में मुसलमानों ने पांच शताब्दियों तक राज्य किया है, तो हिन्दुओं ने अनगिनत शताब्दियों तक राज्य किया है। उनसे पहले भी और उनके बाद तक भी। सबसे निरापद आधार यह है कि अंग्रेजों की विजय के बाद सभी समुदायों का एक समान स्तर है। वे अपने राजनीतिक प्रभुत्व को दरकिनार कर दें। ऐसा व्यवहार अन्यायपूर्ण नहीं होगा और पूरी तरह उन भावनाओं के अनुकूल होगा