3. प्रांतीय विधायिका - Page 76

प्रांतीय विधायिका

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जो भारतीय दंड संहिता के प्रारूपकार आयुक्तों ने भारत मंत्री को संबोधित करते हुए व्यक्त की। उन्होंने कहा है :

‘‘मान्यवर की काउंसिल देखेगी कि हमने प्रस्ताव नहीं किया है कि कम्पनी के राज्य

क्षेत्र में रहने वाले भारत के किसी राजघराने को इस संहिता के प्रभाव से मुक्त रखा

जाए। ऐसा कोई अपवाद किया जाए या नहीं, यह एक ऐसा सवाल है, जिसके

बारे में हम निर्णय करने का साहस नहीं जुटा पाए। इसके लिए वर्तमान संधियों

के बारे में जितनी जानकारी है, उससे अधिक सही जानकारी मिलनी चाहिए। हमें

यह सब पता होना चाहिए कि इन संधियों को किस भावना से समझाया गया है?

वार्ताओं का इतिहास क्या है? घराने विशेष का स्वभाव और उसकी शक्ति क्या

है? उन घरानों के प्रति लोगों की क्या भावनाएं हैं? हम अति विनम्र भाव से यह

कहने की अनुमति चाहते हैं कि प्रत्येक अपवाद बुराई है और यह बुरी बात है कि

किसी व्यक्ति को कानून से बड़ा माना जाए। इससे भी बुरी बात यह है कि लोगों

को पाठ पढ़ाया जाए कि वे कानून से भी बड़ा होने के विशेषाधिकार को एक

ऊंची तथा ईर्ष्यायोग्य विशिष्टता मानें। हम यह भी कहना चाहते हैं कि जिसने

अधिक अर्से तक इन्हें झेला उतनी ही कठिनाई उन्हें दूर करने में होगी। उन्हें दूर

करने का इससे अच्छा अवसर फिर कब मिलेगा, जब सरकार विभिन्न जातियों

तथा धर्म के लोगों के लिए समान रूप से बाध्यकारी नई दंड संहिता लागू कर

रही है। हमें इस बारे में गहन आशंका है कि क्या समान न्याय के लाभों के बारे

में कसौटी निश्चित करने के लिए अति निष्ठा से व्यक्त की गई लोक आस्था के

अलावा और कोई आधार भी हो सकता है।’’

  1. ये बड़ी सूझबूझ वाली बातें हैं और मुझे विश्वास है कि उन लोगों के सामने, जो भारत का शासन चला रहे हैं, इससे बड़ी सूझबूझ की कोई और बात नहीं रखी गई है। न ही उनकी सूझबूझ की बातें केवल उस अवसर या प्रयोजन के लिए हैं, जिनके लिए वे कही गई हैं। मुझे इस बात में कोई शक नहीं कि वर्तमान अवसर के लिए भी उनका उतना ही महत्व है, भले ही अधिक न हो। वास्तव में विधि आयुक्तों की भांति ही मेरा भी विचार है कि यह एक बुरी बात है कि देश का संवैधानिक कानून यह मान्यता दे कि कोई एक समुदाय दूसरे से ऊंचा है। यह और भी बुरी बात है कि जनता के वर्गों को सिखाया जाए कि वे राजनीतिक महत्व के तराजू में स्वयं को इस प्रकार तोलें कि वे एक को ऊंचा मानें और दूसरे को नीचा। जितने अधिक अर्से तक उन धारणाओं को झेला जाएगा, उतना ही अधिक कठिनाई उन्हें दूर करने में होगी और उन्हें दूर करने का इससे अच्छा अवसर फिर कब मिलेगा, जब संसद विभिन्न जातियों व धर्म के लोगों के लिए समान रूप से बाध्यकारी संवैधानिक कानून की एक नई संहिता लागू कर रही है।