3. प्रांतीय विधायिका - Page 77

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

  1. प्रतिनिधित्व के मामले में सभी अल्पसंख्यकों से समान व्यवहार किया जाए, यह अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की समस्या का केवल आंशिक पहलू है। समस्या का एक दूसरा तथा अधिक महत्वपूर्ण पहलू है कि सीटों के बंटवारे के लिए संख्या संबंधी एक संतोषजनक पैमाना तय किया जाए। परन्तु यह एक बहुत विवादास्पद सवाल है। दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों में से एक है कि अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व पूरी तरह उनकी जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए। दूसरा सिद्धान्त जिस पर अल्पसंख्यक दृढ़ता से आग्रह करते हैं, वह है कि यह प्रतिनिधित्व पर्याप्त होना चाहिए। मैं नहीं समझता कि प्रतिनिधित्व का गणितात्मक सिद्धान्त स्वीकार किया जा सकता है। यदि विधान परिषद् कोई चिडि़याघर या अजायबघर होता जहां एक निश्चित संख्या में हर प्रजाति के जीव रखे जाते हैं, तो अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के इस सिद्धान्त को सहन किया जा सकता था। किन्तु यह तो मानना ही होगा कि यह परिषद् कोई चिडि़याघर या अजायबघर नहीं है। यह अधिकार प्राप्त करने, विशेषाधिकार मिटाने और अन्याय रोकने का युद्ध क्षेत्र है। इस दृष्टि से देखने पर कोई अल्पसंख्यक वर्ग देख पाएगा कि उसका प्रतिनिधित्व पूर्णतः उसकी आबादी के अनुपात में है, पर इसके बावजूद वह इतना कम है कि वह विद्वेषी बहुसंख्यकों की मार से अपनी रक्षा और स्थिति में सुधार के लिए जो भी कोशिश करता है, उसमें वह बुरी तरह पिट जाता है। यदि अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का उद्देश्य राजनीतिक तमाशा प्रस्तुत करना है, तो जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व दिए जाने का सिद्धान्त ठुकराना ही पड़ेगा और उन्हें रियायत के तौर पर उनकी जनसंख्या के अनुपात से कुछ अधिक प्रतिनिधित्व देना ही पड़ेगा।

  2. इसमें कोई शक नहीं कि रियायत की जरूरत का महत्व है। पर इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इन रियायतों के मापदंड का सिद्धांत बुद्धिमत्ता और औचित्य से पूर्ण हो। यह समझ लेना होगा कि अल्पसंख्यक समुचित संरक्षण की मांग के बहाने ऐसी मांग कर सकते हैं, जिसे अनर्गल ही कहा जाएगा। ऐसा न हो, इसके लिए हमें पर्याप्त प्रतिनिधित्व की परिभाषा करनी ही होगी। इससे कोई संदेह नहीं कि समुचितता शब्द की कोई निश्चित परिभाषा नहीं हो सकती। परन्तु इसकी अनिश्चितता को काफी कम किया जा सकता है, यदि हम कुछ मोटी बातें ध्यान में रखें। सबसे पहले अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व के मामले में पर्याप्तता और श्रेष्ठता के बीच कोई लक्ष्मण रेखा खींचनी ही पड़ेगी। श्रेष्ठता से मेरा मतलब है, प्रतिनिधित्व का ऐसा विस्तार जिससे अल्पसंख्यक तानाशाह बन जाएं। पर्याप्तता से मेरा अभिप्राय है प्रतिनिधित्व का ऐसा विस्तार, जो अल्पसंख्यकों को इस योग्य बना सके कि बहुसंख्यकों की किसी पार्टी को उनसे गठबंधन करना पड़े। जब कोई पार्टी किसी अल्पसंख्यक समुदाय से गठबंधन के लिए विवश होगी, तो निश्चित रूप से अल्पसंख्यक तानाशाह बन जाएंगे। दूसरी स्थिति यह है कि कोई पार्टी अल्पसंख्यकों से गठबंधन का अनुरोध करे, तो