प्रांतीय विधायिका
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इसका अर्थ है उस अल्पसंख्यक वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है। इसलिए अल्पसंख्यकों के लिए सीटें निर्धारित करते समय, जो पहली बात ध्यान में रखी जानी चाहिए, वह है कि हम दोनों अतियों से बचें। अपर्याप्तता से भी, श्रेष्ठता से भी। इन अतियों से बचा जा सकता है, यदि हम इस नियम को अपना लें कि अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर मुख्यतः इस तरह अंकुश लगाया जाए कि जितनी सीटों के लिए अल्पसंख्यक हकदार होंगे, उनकी संख्या का आधार कुछ सीटों के प्रति उसकी आबादी का वह अनुपात होगा, जिसे किसी ऐसे गुणनखंड से गुणा किया जाएगा, जो एक और दो के बीच का होगा।
- यह सच है कि यह सिद्धान्त केवल उस सीमा को परिभाषित करता है, जिसके अनुसार अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व निश्चित करना होगा। यह फिर भी अनिश्चित और अस्पष्ट रहेगा कि वह गुणनखंड कैसे घटे बढे़। मेरा सुझाव है कि वह अल्पसंख्यकों से सम्बद्ध वर्ग विशेष की जरूरतों के अनुसार घटे बढ़े। इस प्रणाली से हम अल्पसंख्यकों को रियायत देने के किसी बुद्धिमत्तापूर्ण और तर्कसंगत सिद्धांत पर सहमत हो सकते हैं। अल्पसंख्यकों की जरूरतें कमोवेश सही निर्धारण कर सकती हैं। इस बात पर आम सहमति हो सकती है कि राजनीतिक संरक्षण के लिए अल्पसंख्यकों की जरूरतें उस शक्ति के अनुपात में होनी चाहिए, जिसके बल पर उन्हें सामाजिक संघर्ष में अपनी रक्षा करनी है।
स्वाभाविक है कि वह शक्ति अल्पसंख्यकों के शैक्षिक और आर्थिक स्तर पर निर्भर करेगी। अल्पसंख्यकों का शैक्षिक और आर्थिक स्तर जितना ही ऊंचा होगा, राजनीतिक संरक्षण के लिए उनकी जरूरत उतनी ही कम होगी। इसके विपरीत उनका शैक्षिक और आर्थिक स्तर जितना ही नीचा होगा, राजनीतिक संरक्षण के लिए उनकी जरूरतें उतनी ही अधिक होंगी।
- मेरा विचार है कि मेरा दृष्टिकोण समता और पर्याप्तता के सिद्धान्त के आधार पर टिका है। अतः मैं अनुभव करता हूँ कि विभिन्न अल्पसंख्यक वर्गों के लिए मेरे साथियों ने सीटों के जिस आवंटन का प्रस्ताव किया है, उस पर मुझे पूर्वापत्ति करनी ही चाहिए। मेरा प्रस्ताव है कि 140 सीटों में से मुसलमानें को 33 और दलित वर्गों की 15 सीटें दी जाएं। इसके अनुसार परिषद् की कुल सीटों का 23 प्रतिशत मुसलमानों को और 10.7 प्रतिशत दलित वर्गों को मिल सकेगा। इस प्रकार मुसलमानों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से 4 प्रतिशत और दलितों को कोई 2 प्रतिशत अधिक अंश मिल सकेगा। मेरे विचार में इन समुदायों को इतनी रियायत देना तर्कसंगत और आवश्यक है। यह उन्हें मिलनी चाहिए। इसके अलावा एक बात मेरे सुझाव के पक्ष में है और वह है कि इसके अनुसार मुस्लिम प्रतिनिधित्व में कोई परिवर्तन नहीं होगा। मौजूदा परिषद्