62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कुल का 23 प्रतिशत है। मेरे प्रस्ताव के फलस्वरूप नई परिषद् में भी उनके प्रतिनिधित्व का अनुपात उतना ही रहेगा।
- जितने प्रतिनिधित्व का सुझाव मैंने दलित वर्गों के लिए दिया है, उसे कुछ लोगों ने नापसंद किया है। मैं यह नहीं कहता कि उन्होंने विरोध किया है। इस बात को देखते हुए मैं यह जरूरी समझता हूँ कि मैं भ्रांतियों को दूर करने के लिए और अधिक स्पष्टीकरण दूं। इस बात में कोई शक नहीं कि मूलतः दलितों के लिए जो प्रतिनिधित्व निश्चित किया गया है, वह नितांत अनुचित है। संयुक्त रिपोर्ट तैयार करने वालों ने साफ - साफ कहा है (पैरा 153) ‘‘हमारा इरादा वह सबसे अच्छी व्यवस्था करने का है, जो कि हम (दलित वर्गों के) (विशेष) प्रतिनिधित्व के लिए कर सकते हैं।’’ किन्तु इस आश्वासन को साउथबरो कमेटी ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। उसे बाद में मताधिकार के तरीके निश्चित करने, निर्वाचन-क्षेत्रों का गठन करने और यह सिफारिश करने के लिए नियुक्त किया गया था कि भारत में विद्यमान विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में प्रस्तावित लोक शासन प्रणाली में क्या - क्या समंजन किए जाने चाहिएं। दलित जातियों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान करने की समस्या की ओर से साउ थबरो कमेटी ने इस बुरी तरह आंखें मूंद लीं कि भारत सरकार ने भी, जो इस संबंध में कोई खास रुचि नहीं रखती थी, इस बात को अनुभव किया और साउथबरो कमेटी की रिपोर्ट संबंधी अपने ‘डिस्पैच’ के पैरा 13 में कहा ‘‘हम (गैर - सरकारी मनोनयन संबंधी) प्रस्तावों को आम तौर पर स्वीकार करते हैं। लेकिन एक समुदाय ऐसा भी है, जिसके बारे में लगता है कि जिसकी ओर जितना ध्यान कमेटी ने दिया है उससे अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। भारतीय संवैधानिक सुधार के संबंध में दी गई रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दलित वर्गों की समस्या को चीन्हा गया है और उनका लिहाज करते हुए आश्वासन दिया गया है। इन जातियों का उल्लेख इस प्रकार किया गया है ‘हिन्दू - अन्य लोग’। हालांकि प्रतिवेदन में उनकी अलग - अलग ढंग से परिभाषा दी गई है, पर मोटे तौर पर वे एक ही प्रकार के लोग हैं। सिवाय इसके कि उनके प्रति बहिष्कार की कठोरता में थोड़ा अंतर है। उन सभी को कमोवेश मद्रास के पंचनामों में निश्चय ही उस हिन्दू समाज का अंग नहीं माना गया है, जिसे मंदिरों में जाने की आज्ञा है। इनकी संख्या कुल जनसंख्या का पांचवा भाग है और उन्हें मार्ले - मिन्टो परिषद्ों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। कमेटी की रिपोर्ट में दलित वर्गों का दो बार उल्लेख किया गया है, पर सिर्फ यह स्पष्ट करने के लिए कि निर्वाचन - क्षेत्रों की स्थिति संतोषजनक न होने के कारण मनोनयन द्वारा उन्हें प्रतिनिधित्व दिया गया है। रिपोर्ट में इन लोगों के स्वावलम्बन की स्थिति पर कोई विचार प्रकट नहीं किया गया है। न ही मनोनयन की संख्या का सुझाव दिया गया है। (मताधिकार कमेटी) की रिपोर्ट के पैरा 24 में जिन आधारों पर मनोनीत सीटों के परिसीमन का औचित्य ठहराया गया है, वे यह प्रगट नहीं