3. प्रांतीय विधायिका - Page 80

प्रांतीय विधायिका

63

करते कि कमेटी दलित वर्गों का उल्लेख कर रही थी। इस समुदाय के लिए प्रतिनिधित्व के मापदंड के बारे में उनका प्रस्ताव है :

प्रांत कुल जन - दलित वर्गों की कुल सीटें दलित

संख्या जनसंख्या वर्गों की

दस लाख में दस लाख में लिए सीटें

मद्रास 39.8 6.3 120 2 बंबई 19.5 .6 113 1 बंगाल 45.0 9.9 127 1 संयुक्त प्रांत 47.0 10.1 120 1 पंजाब 19.5 1.7 85 - बिहार और

उड़ीसा 32.4 9.3 100 1 मध्य प्रांत 12.0 3.7 72 1 असम 6.0 .3 54 -

221.2 41.9 791 7

ये आंकड़े स्वयं में प्रमाण हैं। यह सुझाव दिया गया है कि ब्रिटिश भारत की कुल जनसंख्या के पांचवें भाग को कोई 800 सीटों में से सात सीटें दी जाएं। यह सच है कि सभी परिषद्ों में मोटे तौर पर पदधारियों का छटा भाग ऐसा होगा, जिससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह दलित वर्गों के हितों का ध्यान रखेगा, परन्तु हमारे विचार से यह व्यवस्था सुधार संबंधी रिपोर्ट के लक्ष्य से मेल नहीं खाती। इसमें लिखा गया है कि दलित वर्गों को आत्मरक्षा का पाठ भी पढ़ना चाहिए।

निश्चय ही यह आशा मृगमरीचिका सी ही होगी कि जिस असेम्बली में 60 से 90 सवर्ण हिन्दू हैं, उसमें इस समुदाय के केवल एक सदस्य को शामिल करके वह परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। रिपोर्ट के पैरा 151, 152, 155 के सिद्धान्तों को साकार करने के लिए हमें बहिष्कृतों के साथ और अधिक उदार व्यवहार करना ही होगा।

  1. संयुक्त प्रवर समिति ने भी माना है कि प्रतिनिधित्व के सवाल के बारे में साउ­ थबरो कमेटी ने दलितों के साथ अन्याय किया है। कमेटी को अपनी रिपोर्ट में कहना पड़ा : ‘‘दलित वर्गों के लिए प्रस्तावित प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। मताधिकार कमेटी की रिपोर्ट में वर्णित परिभाषा में भारत की कुल जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात शामिल है। सोचते हैं कि उसकी सलाह के मुताबिक भारत सरकार को यह हिदायत दी जाए कि इन वर्गों को मनोनयन के रूप में और अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। उसके लिए हर प्रान्त में स्थानीय सरकार से परामर्श करके दलित वर्गों की संख्या के अनुसार