64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रतिनिधियों की संख्या निश्चित की जाए। यह प्रतिनिधित्व, यदि आवश्यक हो, तो सामान्य निर्वाचन - क्षेत्र के अलावा होना चाहिए, उसे घटाकर नहीं। निश्चय ही इस सबका कोई फल नहीं निकला और साउथबरो ने दलित वर्गों के साथ जो अन्याय किया है, उसे दूर नहीं किया जा सका। वर्तमान प्रयास का उद्देश्य दलित जातियों को अत्यधिक प्रतिनिधित्व देना नहीं है। यह तो अन्याय को दूर करने का प्रयास है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रतिनिधित्व के मापदंड के सुझाव पर अनापशनाप होने का आरोप लगाया जा सकता है। मुडीमैन कमेटी ने भी कहा है कि ‘‘इस तथ्य को सामान्यतः स्वीकार किया गया है और यह वांछनीय है कि इन दोनों वर्गों (अर्थात् श्रमिक वर्गों और दलित वर्गों) को और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए’’ और कहा है कि वह इस दृष्टिकोण से सहमत हैं। उसने प्रस्ताव किया कि उन्हें 113 की विधान परिषद् में 11 स्थान दिए जाएं। यदि 133 में से 11 सीटें तर्कसंगत कोटा है तो 140 में से 15 सीटें देना तो बहुत मामूली बात है। 15 का कोटा इसलिए अधिक लगता है कि आरंभिक कोटा बहुत ही कम था। जो 15 के कोटे पर यह कह कर एतराज करते हैं कि मौजूदा कोटे की अपेक्षा यह जरूरत से ज्यादा है, वे भूल जाते हैं कि जो कोटा मानक मापदंड के रूप में लागू है, वह न तो न्यायसंगत है और ना ही सही।
- एक और मामले में स्पष्टीकरण की जरूरत है। मेरे साथियों ने अपनी रिपोर्ट के पैरा 16 में जिसमें उन्होंने मुसलमानों के लिए सीटों के आवंटन के सवाल पर चर्चा की है, कहा है : ‘‘हमारे दो सदस्यों सरदार मजूमदार और डॉ. अम्बेडकर की राय है कि यह व्यवस्था तभी तक कायम रह सकती है जब तक लखनऊ समझौता प्रत्येक प्रांत के बारे के मान्य है।’’ मेरे साथी मेरी बात समझ नहीं पाए और इसीलिए मेरे बारे में गलत व्याख्या की है। मैं यह कहना चाहता था कि चूंकि उन्होंने सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों अथवा मुसलमानों को दी जाने वाली सीटों की संख्या का औचित्य नहीं बताया है, अतः बेहतर होगा कि वे अपनी रिपोर्ट में कह दें कि वह लखनऊ समझौते के अनुसार हैं। जिस ढंग से मेरे साथियों ने मेरे बारे में कहा है, उससे लगता है कि मैं लखनऊ समझौते का समर्थन करता हूँ। इस अवसर पर मैं कहना चाहूंगा कि यह कथन नितांत अनुचित है।
2. सीटों का भौगोलिक बंटवारा
- मेरे साथियों से मेरा मतभेद केवल विभिन्न अल्पसंख्यकों के लिए सीटों के आवंटन के सवाल तक सीमित नहीं है। वह विभिन्न निर्वाचन - क्षेत्रों के लिए सीटों के बंटवारे के सवाल के बारे में भी है। वर्तमान परिषद् के बारे में एक अप्रिय उजागर तथ्य यह है कि कुछ भागों को अधिक प्रतिनिधित्व मिला है, कुछ को कम। दोष कितना बड़ा है, वह निम्रांकित आंकड़ों से प्रकट हो जाएगा।