66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कर दिया जाए। यह एक ठोस शिकायत है जिसे कर्नाटक के साक्ष्य के अनुसार गहराई से महसूस किया ही जाना चाहिए। जैसे - जैसे विधान परिषद् का दायित्व बढ़ेगा और उसके साथ जैसे - जैसे लोक प्रशासन पर उसका प्रभाव बढ़ेगा, वैसे - वैसे शिकायत भी तीखी होगी ही।
- इस प्रेसिडेंसी के कुछ भागों को अन्य भागों को क्षति पहुंचाकर अधिक प्र तिनिधित्व दिए जाने का दोष इस कारण उपजा कि साउथबरो कमेटी ने काफी मनमाने ढंग से कार्य किया और सीटों के बंटवारे के मामले में कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं अपनाया। मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे साथियों ने कहा है कि जहां तक संभव हो, सीटों का बंटवारा एकरूपता के सिद्धान्त को सीटों के अनुसार किया जाए। परन्तु मेरी शिकायत है कि उन्होंने सबसे निकृष्ट सिद्धान्त को सीटों के बंटवारे का आधार बनाया है। सरकारी खजाने में अदायगी, निर्वाचकों की संख्या और निर्वाचन - क्षेत्र की जनसंख्या इन तीन विचारणीय मापदंडों को सीटों के बंटवारे का आधार स्वीकार किया जा सकता है। इन तीनों में से निर्वाचकों का मापदंड सबसे अन्यायपूर्ण और अनिश्चित है। पहली बात तो यह है कि जहां मताधिकार इतना प्रतिबंधित है, जैसा कि इस समय हमारे यहां है, तो उसका अर्थ होता है पैसे वालों का राज। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि सम्पत्ति की योग्यता के मनमाने मापदंड के अनुसार कोई खास क्षेत्र निर्वाचकों का बुनियादी कोटा नहीं बन पाता, तो उसे प्रतिनिधित्व मिल ही नहीं पायेगा। दलित वर्गों के लिए ‘बहुमत’ ने जिस बंटवारे का प्रस्ताव किया है, उससे यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि निर्वाचकों की इस कसौटी को अपनाने का यही अनिवार्य परिणाम होगा। इस प्रस्ताव के अनुसार कुछ लोगों में तो दलितों को ढेर सारा प्रतिनिधित्व मिल जायेगा, जबकि प्रेसिडेंसी के कुछ अन्य भागों के दलित खाली हाथ रह जाएंगे। जिस सिद्धान्त का ऐसा बेतुका परिणाम निकलता हो, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसे ठुकराया ही जाना चाहिए। राजस्व का मापदंड निर्वाचकों की संख्या के मापदंड से बेहतर है। क्योंकि यह दलील दी जा सकती है कि सरकार पर असर डालने की शक्ति सरकार को दिए गए राजस्व के अनुरूप हो। यह मापदंड भी अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह कपटपूर्ण और अपर्याप्त है। उसका कारण यह है कि उगाही करते समय यदि राजस्व न दिया गया हो, तो यह जानना मुश्किल हो जाएगा कि किसी राज्य का वास्तविक राजस्व क्या है? एक निर्वाचन - क्षेत्र जिसमें काफी राजस्व की उगाही की जाती है, उसे सीटों के बंटवारे में घाटा हो सकता है, क्योंकि उसका भुगतान दूसरे में किया जाता है। लेकिन इन दोनों मापदंडों के बारे में सबसे गंभीर आपत्ति यह है कि राज्य निर्वाचकों या करदाताओं के लाभ के लिए नहीं होता। न ही राज्य अपना बल प्रयोग केवल उन्हीं तक सीमित रखता है। उसका क्षेत्राधिकार उन सभी लोगों पर होता है, जो उसकी प्रजा हैं। इसका कोई सवाल नहीं होता कि वह करदाता या निर्वाचक है या नहीं। इसमें यह निष्कर्ष निकलता है कि सीटों के बंटवारे