प्रांतीय विधायिका
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के कारण ग्रामीण प्रतिनिधियों को ऐसी प्रविष्टि मिली, जिससे उन्हें वंचित नहीं किया गया था। इसलिए इन योग्यताओं को बहाल करने का कोई पर्याप्त कारण नहीं है। इस प्रकार अब स्थिति यह है कि केवल बंबई और पंजाब प्रांत ही ऐसे प्रांत है जहां अब भी आवासीय योग्यता की शर्त लगी हुई है। मध्य प्रांत में भी प्रतिबंध का उतना कठोर निर्वचन नहीं किया जाता, जितना इस प्रेसिडेंसी में। मेरे विचार में यह उचित ठहराना मुश्किल है कि भारत के इस अति विकसित प्रांत में इस प्रतिबंध को बनाए रखा जाए, जबकि इससे काफी पिछड़े प्रांतों में इसकी जरूरत अनुभव नहीं की जाती। मेरे विचार में इस प्रतिबंध को बनाए रखना कुछ हद तक इस बात के लिए जिम्मेदार है कि परिषद्ों में कुछ घटिया स्तर के लोग चुन लिए जाते हैं और प्रतिष्ठा, योग्यता और सिद्ध राजनीतिक क्षमता वाले ऐसे व्यक्ति परिषद्ों में नहीं आ पाते, जो अधिकांशतः विशाल नगरीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। वे इस आवासीय योग्यता की शर्त के कारण किसी अन्य स्थान से चुनाव लड़ पाते, यदि किसी कारण वे अपने आवासीय क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए मैं सिफारिश करता हूँ कि इस प्रान्त से भी अब यह आवास की शर्त हटा दी जाए। अध्याय 4
लखनऊ समझौता
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मैं जानता हूँ कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन - क्षेत्र रखे जाने और सीटों के बंटवारे के बारे में मेरी सिफारिशें लखनऊ समझौते की शर्तों से टकराती हैं, क्योंकि वे किसी हद तक मुस्लिम सम्प्रदाय के प्रतिनिधित्व पर प्रभाव डालती हैं। 1919 में बनाए गए नियमों के अधीन जिस रूप में मुस्लिम संप्रदाय के लिए प्रतिनिधित्व तय किया गया, उसका मुख्य आधार था लखनऊ समझौता नामक समझौता। इस समझौते के अनुसार 1917 में लखनऊ में मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच एक करार हुआ। मुसलमानों का प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग ने और हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व कांग्रेस ने किया। इसके अनुसार प्रांतीय तथा केन्द्रीय विधायिका में मुसलमानों को सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडल और अलग - अलग अनुपात में सीटें प्राप्त हुईं। मुझे अहसास है कि मुस्लिम संप्रदाय के प्रतिनिधित्व के बारे में जो प्रस्ताव मैंने प्रस्तुत किए हैं, वे इस समझौते के प्रतिकूल हैं। मैं यह अनुभव करता हूँ कि यह मेरा दायित्व है कि मैं यह बताऊं कि मैं ऐसा सोचता हूँ कि इस समझौते को रद्द कर दिया जाए।
मेरा पहला तर्क यह है कि जो करार लखनऊ समझौते के अनुसार किया गया था, वह गलत करार है। सभी स्थानीय सरकारें इसे स्वीकार करती हैं। मताधिकार कमेटी की सिफारिशों की समीक्षा करने वाले भारत मंत्री के नाम अपने ‘डिस्पैच’ में भारत सरकार ने कहा था : ‘‘हमने नोट किया है कि स्थानीय सरकारों ने समझौते पर सहमति सर्वसम्मति से व्यक्त नहीं की है। मद्रास सरकार ने इस समझौते पर