70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ध्यान दिए बिना मुसलमानों को प्रतिनिधित्व दिए जाने के बारे में अपने अलग प्रस्ताव तैयार कर डाले। बंबई सरकार ने हालांकि इसे स्वीकार कर लिया पर उसने कहा कि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की योजना पर बहस होनी चाहिए। मध्य प्रांत के चीफ कमिश्नर ने अलग मुस्लिम निर्वाचक - मंडलों का विरोध किया और विचार प्रगट किया है कि इस समझौते में जो प्रतिशत रखा गया है, ‘वह इस संप्रदाय की संख्या और स्थिति के अनुपात में तनिक भी अनुरूप नहीं है’। ना ही भारत सरकार ने प्रांतीय सरकारों की इस आम राय के साथ मतभेद प्रकट किया। लखनऊ समझौते के परिणामों का विभिन्न प्रांतों में मूल्यांकन करते समय भारत सरकार ने कहा, ‘नतीजा यह है कि जनसंख्या के आधार पर उन्हें जो मिलता, बंगाल के मुसलमानों को उसका केवल तीन-चौथाई और पंजाब के मुसलमानों को दस में से नौ भाग ही मिल पाता है। अन्य प्रांतों के मुसलमानों को अधिक हिस्सा मिला है और कुछ प्रांतों में तो अप्रत्याशित रूप से अधिक। हम स्वयं भी नहीं समझ पाते कि ऐसा नतीजा विभिन्न प्रांतों के मुसलमानों के बीच या मुसलमानों और शेष समुदायों के संबंध दर्शाता है।’ सर विलियम विसेंट ने तो अपने विमति - टिप्पणी में यहां तक कह डाला, ‘लखनऊ समझौते के ब्योरे की परवाह न करते हुए हमें अपने वचनों को पूरा करने के लिए उस रीति से कार्यवाही करनी चाहिए, जिसे हम स्वयं सर्वोत्तम रीति समझते हैं’।’’
- लखनऊ समझौते में इतनी ही गलती नहीं है कि मुसलमानों के साथ उसमें अलग-अलग प्रांतों में अलग - अलग व्यवहार किया गया है। कुछ में उनके साथ उदारता बरती गई है और कुछ अन्य में कंजूसी। अपेक्षाकृत यह छोटी सी बात है। लखनऊ समझौते की मुख्य त्रुटि यह है कि मुसलमानों के लिए सीटें अलाट करते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि इससे दूसरों के हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। जैसा कि भारत सरकार ने कहा है, समझौते के रचनाकारों ने यह बात ध्यान में नहीं रखी कि जो कुछ लाभ मुसलमानों को दिया जा रहा है, वह दूसरों के हित या हितों से छीना जा रहा है। सर विलियम विसेंट ने भी बड़ी सावधानी से इसे इंगित किया है। अपने विमति - टिप्पणी में उन्होंने यह भी कहा है, ‘‘आज इस समझौते को आलोचना से कहीं अधिक समर्थन मिल रहा है, लेकिन बाद में जब मतों और प्रतिनिधित्व के महत्व का अहसास होगा, तो यह आशा करनी ही होगी कि जिन हितों को इससे गहरी चोट पहुंची है, वे शिकायत करेंगे कि भारत सरकार ने इसका समर्थन करके कुछ उचित कार्य नहीं किया है।’’ जिस गहराई के साथ इस भविष्यवाणी का अहसास किया गया है, वह उल्लेखनीय है। लखनऊ समझौते के नतीजे के प्रति जितना व्यापक असंतोष अनुभव किया गया है, इस बात का जरूरत से ज्यादा प्रमाण है कि लखनऊ समझौते में जो करार है वह गलत करार है। यह आपत्ति करने में कोई अनौचित्य नहीं है कि जो गलत तरीके से तय किया गया है, उसे फिर से तय किया ही जाना होगा। इस मांग का मुसलमान विरोध करेंगे ही। अनाप-शनाप पैमाने पर प्रतिनिधित्व प्राप्त करने