3. प्रांतीय विधायिका - Page 88

प्रांतीय विधायिका

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के बाद यह निश्चित है कि वे पूर्वोदाहरण और विगत अधिकारों को अपने तर्क का आधार बनायेंगे। लेकिन जैसाकि थामस पैन ने कहा है, अपने अधिकारों के संबंध में पुरातन पर आधारित उदाहरणों को अपने तर्क का आधार मानने वालों की गलती यह है कि वे उस आदिकाल की बात नहीं करेंगे जब कोई निहित स्वार्थ होता ही नहीं था। यदि वे करेंगे तो अनुभव करेंगे कि अधिकार शाश्वत नहीं होते, वे इतिहास की घटनाएं होते हैं। अतः समय - समय पर उनमें पुनः तालमेल बिठाना होगा। ऐसा होना ही चाहिए, क्योंकि समूची राजनीतिक तथा सामाजिक प्रगति इस आप्त वाक्य पर टिकी है कि यदि वे थे तो गलती की वैध परम्परा वैध नहीं होती और जिसका समुचित निपटारा नहीं होता, उसका कभी निपटारा नहीं होता।

यह एकमात्र मिसाल नहीं है, जिसके द्वारा लखनऊ समझौते जैसे समझौते को बदलने की मांग की जा रही है। आयरलैंड और इंग्लैंड के बीच संघ संबंधी अधिनियम भी ऐसा ही समझौता था। दरअसल लखनऊ समझौते से कहीं अधिक बाध्यकारी शक्ति उसकी थी। यह एक संधि थी, जिसमें आयरलैंड को संसद में 100 सीटों की गारंटी दी गई थी। पर जब बैलफोर सरकार को यह अहसास हुआ कि आयरलैंड को दिया गया अत्यधिक प्रतिनिधित्व एक निश्चित गलती है, तो 1905 में उन्होंने एक विधेयक प्रस्तुत करने में कोई संकोच नहीं किया, जिससे आयरिश सीटों की संख्या में 30 की कमी आ जाती। यह दूसरी बात है कि बैलफोर सरकार ने इस्तीफा दे दिया और वह विधेयक कानून नहीं बन सका। लेकिन फिर भी तथ्य यह है कि प्रतिनिधित्व के मामले में आयरिश करार में फेरबदल की वर्जना इस तथ्य के आधार पर नहीं की गई कि यह करार दोनों पक्षों के बीच एक समझौते पर आधारित था। ना ही बैलफोर इस दृष्टिकोण से सहमत थे कि यह संशोधन केवल आयरलैंड की सहमति से ही किया जा सकता है। उन्होंने आयरिश विरोध की शिद्दत के बावजूद पुनर्वितरण की योजना चलाई। परन्तु कोई उदाहरण ढूंढ़ने के लिए दूर जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है, यदि वह अपने निकट ही मौजूद हो। श्रीलंका के संविधान में भी सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और सांप्रदायिक आधार पर, सीटों के बंटवारे को अनुमति प्रदान करने वाले विभिन्न संगठनों के बीच हुए करारों तथा समझौतों को मान्यता दी गई थी। किन्तु 1928 के श्रीलंका आयोग ने इस दृष्टिकोण पर जोर दिया कि ‘‘किसी भी अवस्था में प्रतिनिधित्व की समूची समस्या पर नये सिरे से विचार करते समय जातियों और समूहों के बीच हुए आपसी समझौते भले ही वे ध्यान दिए जाने योग्य हों, समग्र रूप से श्रीलंका के लोगों के हितों से सम्बद्ध आधारों से श्रेष्ठ नहीं हो सकते।’’ इसलिए आयोग ने लंका में प्रतिनिधित्व की पूरी योजना को संशोधित करने में इस कारण कोई संकोच नहीं दिखाया कि वह मान्य थी। अन्यत्र जो किया गया है, उसकी मांग यहां की जा रही है।

  1. यह भी याद रखा जाना चाहिए कि लखनऊ समझौता न केवल इसलिए महत्वहीन है, यदि भारत सरकार के शब्दों में कहा जाए कि ‘उसकी शर्तें राजनीतिक