3. प्रांतीय विधायिका - Page 89

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

वार्ता की उपज हैं न कि सुविचारित तर्क की’, बल्कि इसलिए भी कि यह समझौता उन संगठनों ने किया है, जिसमें से किसी को भी उन लोगों के नाम पर बोलने का कोई वास्तविक अधिकार नहीं था, जिसकी ओर से बोलने का वे दावा करते थे। आल इंडिया मुस्लिम लीग को सभी मुसलमानों के लिए बोलने का कोई अधिकार नहीं था, यह भारत सरकार का दृष्टिकोण था। यह बात भारत सरकार के उस डिस्पैच से काफी स्पष्ट हो जाती है, जो उसने साउथबरो कमेटी की रिपोर्ट के बारे में भेजा था। जहां तक कांग्रेस का संबंध है, यह एक निर्विवाद तथ्य है कि यह गैर - ब्राह्मणों तथा दलित वर्गों के बहुत बड़े जनसमूह का प्रतिनिधित्व नहीं करती। एक ऐस समझौता, जो उन संगठनों के बीच हुआ हो, जो आम जनता के घटक समूह नहीं हैं, उससे वे स्वयं को तो बांध सकते हैं, परन्तु निश्चय ही उससे जनसामान्य बांधा नहीं जा सकता। इस समझौते को ऐसे मान्यता देना जैसे वह विभिन्न राज्यों के पूर्णाधिकारी दूतों के बीच हुई संधि हो, लीग और कांग्रेस को ऐसा अधिकार देना है, जो उसके पास था ही नहीं। यह आवश्यकता है कि हम इस समझौते की बाध्यकारी शक्ति का मूल्यांकन करें, क्योंकि बंबई सरकार का दृष्टिकोण इस संबंध में ऐसा है, ‘‘पृथक निर्वाचक - मंडलों को समाप्त करने की दिशा में किया जाने वाला कोई परिवर्तन ऐसे समझौते पर आधारित होना ही चाहिए, जो दो संप्रदायों के बीच हुआ हो और वह मुसलमानों पर उनकी इच्छा के विपरीत थोपा नहीं जा सकता। यह सवाल अखिल भारतीय स्तर का भी है। और इस पर हर प्रेसिडेंसी के लिए अलग - अलग आधार पर विचार नहीं किया जा सकता। बंबई सरकार उस दृष्टिकोण से आबद्ध है, जो उसने 1916 में व्यक्त कर दिया था कि सांप्रदायिक निर्वाचक - मंडलों को वह स्वीकार नहीं करती और उनका उन्मूलन होना चाहिए यदि उसे लखनऊ समझौते की भांति दोनों पक्षों की सहमति से प्राप्त किया जा सके।’’ मेरे विचार में यह रवैया गैर - जिम्मेदाराना भी है और खलनायक भी। गैर - जिम्मेदाराना वह इसलिए है कि इस मामले में निर्णय के अधिकार का वह समर्पण करता है। यह ठीक है कि भारत सरकार ने इसे उचित समझा कि इस समझौते की ‘उपेक्षा न की जाए’। समझौता एक अति विवादास्पद मामले में संप्रदायों की ओर से किया गया सच्चा प्रयास था और एक बड़े संप्रदाय का अपने तात्कालिक हितों का सर्वसम्मति और संयुक्त राजनीतिक प्रगति के हितों में कम से कम बलिदान तो था ही। ‘‘परन्तु यह तो दिन को रात कहने जैसा है कि भारत सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण का यह दृष्टिकोण कि मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने के प्रश्न के बारे में उनकी स्थिति केवल उस फैसले को दर्ज करने की थी, जो कांग्रेस और लीग के बीच परस्पर वार्ता से हुआ हो।’’ दरअसल सर विलियम विसेंट ने सावधानीपूर्वक कहा है ‘‘इस मामले में भारत सरकार संसद के प्रति (उसके) दायित्व को दूसरों के हाथों में नहीं दे सकती।’’

  1. बंबई सरकार का रवैया खतरनाक है, क्योंकि उसने इसे एक गलती माना है फिर भी वह भूल सुधार का भार स्वयं उठाने को तैयार नहीं। मैं इस रवैये को क्षम्य