प्रांतीय विधायिका
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अपराध मान लेता, यदि यह संवैधानिक व्यवस्था की गलती न होती। परन्तु दुर्भाग्य से यह एक संवैधानिक गलती है और उसने अपना डेरा उसके एक अति महत्वपूर्ण अंग में डाल लिया है। अतः उसका व्यवस्था के संचालन पर घातक प्रभाव पड़ेगा। इस तरह की गलती असहनीय है। संविधान के अभिनव परिवर्तन में ऐसी गलती से पूरे समाज और उसके प्रत्येक अंग पर सीधा असर पड़ेगा। यह जनता तथा सरकार दोनों के लिए विपत्ति और विनाश से भरपूर हो सकती है। और उसका निराकरण वस्तुतः असंभव होगा। बंबई सरकार यह मान कर चली है कि सभी संवैधानिक परिवर्तन अंतिम हैं और उनका पालन अनिवार्य है, दुष्परिणाम चाहे जो भी हों। निस्संदेह यह धारणा इस भाग्यवादी समर्पण से पैदा होती है कि इन मामलों में कोई अनुत्तरदायी शक्ति हमें जबरन विनाश के अपरिहार्य कगार की दिशा में निश्चित पथ पर धकेल देती है। परन्तु मुझे खुशी है कि भारत सरकार ने इस समझौते को स्वीकार करते समय यह स्वीकार नहीं किया है कि अधिनियम की शर्तों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस मामले को अस्पष्ट न रखते हुए उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह व्यवस्था प्रथम कानूनी कमीशन के बाद लागू नहीं होगी। साउथबरो कमेटी की रिपोर्ट पर अपने ‘डिस्पैच’ में उसने कहा, ‘‘इससे पहले कि हम इस रिपोर्ट पर विचार करें, कुछ महत्व का एक प्रारंभिक सवाल उभर कर सामने आता है। जैसा कि आप देखेंगे, कमेटी का उद्देश्य काफी हद तक सिद्धान्त निर्धारण नहीं रहा है। उसके सामने जो विभिन्न समस्याएं आईं, उन पर विचार करते समय उन्होंने सामान्यतः समझौते की कोशिश की, बजाए इसके कि समाधानों के कोई सामान्य तर्क ढूंढते। निस्संदेह समय की तात्कालिक अपेक्षाओं के कारण उनके लिए कुछ और कर पाना कठिन था। परन्तु उनके प्रस्तावों पर विचार करते समय हमें स्वयं से प्रश्न करना है कि क्या इन तरीकों के नतीजे किसी हद तक स्थायी होने चाहिए। ख्. . ., परिवर्तन तंत्र कोई भी हो, बहरहाल हमें इस व्यावहारिक सवाल पर विचार करना है कि कब तक हम भारत में स्थापित प्रथम निर्वाचन प्रणाली को झेलना चाहते हैं। क्या प्रांतीय विधायिका की इच्छा से आरंभ में ही इसका पुनर्निर्माण किया जा सकेगा या यह कम से कम प्रथम कानूनी कमीशन बनने तक इसमें परिवर्तन नहीं होगा? दोनों स्थितियों के बारे में कुछ वजनदार तर्क हैं। दायित्व के संवर्धन के हित में यह वांछनीय नहीं है कि निश्चित अनुपात में विभिन्न हितों के प्रतिनिधित्व को बंधे - बंधाए ढर्रे में ढाल दिया जाए, जितने लम्बे अर्से तक पृथक वर्ग और सांप्रदायिक निर्वाचन - मंडल कठोर शिकंजे में बंधे रहेंगे, प्रतिनिधित्व के सामान्य तरीकों की ओर अग्रसर होना उतना ही कठिन होगा। दूसरी ओर यह किसी भी दशा में वांछनीय नहीं कि उसके संशोधन के लिए सतत संघर्ष को न्योता दिया जाए।’’ यह बताना कमीशन का काम है कि क्या इस गलती की उम्र को लम्बा करना ही होगा। मुझे आशा है कि कमीशन केवल यही नहीं कहेगा, ‘‘ठीक है, हम पूर्णतः अनुभव करते हैं कि सांप्रदायिक प्रणाली के सिद्धान्त पर उठाए गए एतराजों में बल है। परन्तु हम लाचार हैं क्योंकि