74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
भारत ने उत्तरदायी सरकार के लिए यह मार्ग जानबूझकर चुना है।’’ आयोग यह अनुभव करेगा कि न केवल ईमानदारी भरे औचित्य का तकाजा है कि उसका यह फर्ज है कि वह सही मार्ग - निर्देशन करे और उस पर भारत को चलाए बल्कि अंग्रेज अधिकारियों का नैतिक दायित्व भी उसके लिए जिम्मेदार है क्योंकि उन्होंने ही 1909 में गलत रास्ता दिखाया था। अध्याय 5
दूसरा सदन
- मेरे साथियों ने इस प्रेसिडेंसी की विधायिका के एक भाग के रूप में दूसरे सदन के गठन की सिफारिश की है और उसके गठन के स्वरूप के बारे में सुझाव दिए हैं। मेरे साथियों ने इसके गठन से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों पर विशेष ध्यान नहीं दिया है। यदि दूसरा सदन बनता है, तो वह पहले सदन से भिन्न होना ही चाहिए। अधिकारों के मामले में यह देखा जाए कि दूसरा सदन पहले के कामों में अड़ंगे न डाले। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा दूसरा सदन बनाना कठिन होगा, जो इन दोनों कसौटियों पर खरा उतरे। मनोनयन करके दूसरा सदन बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता। मनोनीत दूसरे सदन के गठन के बारे में कनाडा की सीनेट एक स्थायी चेतावनी है। उसको कोई नैतिक अधिकार नहीं होगा, जैसा कि एक निर्वाचित सदन को होता है कि वह फैसले लागू करा सके। ना ही इसे चुने हुए सदन की तरह इतनी स्वतंत्रता मिल सकती है कि वह संशोधी सदन की तरह उस कार्यपालिका के कार्यों पर निर्णय दे सके, जो उसे आकार देती है। यदि दूसरा सदन निर्वाचित सदन होगा, तो प्रथम सदन से उसका सहज संबंध उनके अपने मताधिकार, निर्वाचन की अवधि और उनके अधिकारों पर निर्भर करेगा। यदि दूसरे सदन का निर्वाचन सीमित मताधिकार के आधार पर होता है, तो वह कुलीनतंत्र में से एक छोटे से वर्ग को प्रशासी वर्ग बना देगा। उसका जनता के भाग्य पर खास नियंत्रण होगा। दूसरा सदन संशोधी सदन तो होगा नहीं, जो निचले सदन के जल्दबाजी में किए गए फैसले पर अंकुश रख सके, बल्कि ऐसा सदन होगा, जो सामान्य सुधार के हित न करके निहित स्वार्थों का हित करेगा। यह अनुदारवादी प्रशासन के अधीन निष्क्रिय हो जायेगा और आमूल परिवर्तनवादी प्रशासन के अधीन सजग रहेगा। जो परिवर्तन इसे करना चाहिए उसे वह नहीं करेगा और जो नहीं करना चाहिए, वह करेगा और शायद बाधाएं उत्पन्न करेगा। यदि दोनों का निर्वाचन समान मताधिकार के आधार पर होगा, तो दूसरा सदन पहले की नकल ही होगा और फालतू माना जाएगा और यदि दूसरे सदन का निर्वाचन पहले के साथ - साथ होता है, तो भी नतीजा वही निकलेगा। यदि दूसरा सदन पहले से भिन्न समय में चुना जाएगा, तो इससे कार्यपालिका कमजोर होगी ही और उसकी दक्षता घट जाएगी, क्योंकि वह समुचित नीति - निर्धारण के मार्ग में एक अड़ंगा होगा और कार्यपालिका की नीतियों में वह इतनी उग्र बाधा डाल सकता है कि इससे बार - बार आम चुनाव कराने पड़